कब्र बोलती हैं
आज बेटी को स्कूल छोड़कर लौट रहा था तो मन में ख्याल आया कि क्यों न कब्रिस्तान चला जाऊँ। मेरे पिता भी इसी कब्रिस्तान में दफ़्न हैं। सुबह का समय था। वातावरण शांत, निर्मल और पवित्र था।
कब्रिस्तान के मुख्य द्वार पर दाख़िल होने की दुआ लिखी हुई थी। मैंने उसे पढ़ा। उसका अर्थ था—
“ऐ मोमिनो! तुम पर सलाम हो। हम भी जल्द ही तुम्हारे पास आने वाले हैं। हम अपने लिए और तुम्हारे लिए अल्लाह से आफ़ियत और ख़ैरियत की दुआ करते हैं।”
यह केवल एक दुआ नहीं, बल्कि हर इंसान के लिए एक चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि आज जो यहाँ हैं, कल हमें भी यहीं आना है।
अंदर पहुँचा तो ऐसा लगा मानो सब अपने-अपने बिस्तरों पर गहरी नींद में सोए हों। चारों ओर ऐसी खामोशी थी, जैसे हर कोई बहुत कुछ कहना चाहता हो, लेकिन अब हमेशा के लिए मौन रहने की कसम खा चुका हो। शायद बोलते-बोलते थक गए हों, दुनिया से दिल भर चुका हो, इसलिए अब अपने-अपने घरों में गुमनाम और ख़ामोश पड़े हों।
ऐसे ही क्षणों में यह शेर बरबस याद आ जाता है—
हुए नामवर बेनिशाँ कैसे-कैसे,
ये ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे-कैसे।
16 जनवरी 2021 को मेरे प्रिय पिता भी इस दुनिया से हमेशा के लिए रुख़्सत हो गए और इसी कब्रिस्तान में दफ़्न हुए। इतनी बड़ी आबादी में यह छोटा-सा कब्रिस्तान न जाने कितने लोगों को अपने सीने में जगह देता होगा।
मुझे अपने अब्बा की कब्र की जगह तो याद है, लेकिन यह बताना मुश्किल है कि उनमें से कौन-सी कब्र उनकी है। इसे मेरी बदनसीबी कह लीजिए या मेरे वालिद की खुशनसीबी। आखिर मरने के बाद किसे कब तक याद रखा जाता है? यहाँ तो ज़िंदा लोगों को भी कौन पूछता है। यदि किसी इंसान ने अपने किरदार और कामों से लोगों के दिलों में जगह बनाई हो तो वह मरकर भी ज़िंदा रहता है, और जिसने ऐसा न किया हो, वह जीते-जी भी भुला दिया जाता है।
फ़ातिहा पढ़कर मैं ख़ामोश खड़ा रहा। चारों ओर सन्नाटा था। ऐसी जगह कोई साथ भी हो तो वह भी चुप रहना पसंद करता है। शायद ही कोई इतना बेपरवाह हो जो कब्रिस्तान में भी फ़िज़ूल बातें करे। यहाँ की ख़ामोशी दुनिया के तमाम शोर से कहीं ज़्यादा बोलती है।
मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे पिता सामने से बाँहें फैलाए मेरी ओर चले आ रहे हों। उनका यही अंदाज़ हुआ करता था। जब भी कुछ दिनों बाद मुलाक़ात होती, वे दूर से ही अपनी बाँहें फैला देते, मानो दौड़कर मुझे सीने से लगा लेना चाहते हों। ऐसा लगा जैसे आज भी वे मुझे गले लगाना चाहते हों, मेरे सिर पर स्नेहभरा हाथ फेरना चाहते हों और लंबे समय बाद मिलने की खुशी में मेरा हाल-चाल पूछना चाहते हों।
सुबह की ठंडी हवा ऐसी महक बिखेर रही थी, जैसे क्षितिज से किसी ने खुशबुओं से भरी हवा चला दी हो। । शबनम की बूँदें ज़मीन पर मोतियों की तरह बिखरी थीं और पैरों को छूकर जैसे अपनापन जता रही थीं। मेरे पिता की यादें भी उन्हीं शबनमी बूँदों की तरह बिखरी हुई थीं। किसी एक याद को छूता तो भावनाओं की एक पूरी दुनिया सामने आ जाती।
याद करने की ज़रूरत ही नहीं थी। बस ज़िंदगी का एक पुराना चैनल खुल गया था और बचपन से आज तक की तमाम यादें चलचित्र की तरह आँखों के सामने चलने लगीं।
उनकी उँगली पकड़कर चलना…
उनसे हर बात पर लिपट जाना
बचपन मे कंधों पर बैठाकर कठिन रास्ते पार कराना
काँटों से बचाना…
कीचड़ में गिरने न देना…
आँधी में अपनी बाँहों में छिपा लेना…
धूप में अपने अंगोछे का साया कर देना…
प्यास लगने पर पानी पिलाना…
भूख लगने पर प्यार से खाना खिलना
उनकी नसीहतें…
उनके दिखाए रास्ते…
मेरी अच्छाइयों पर मुस्कुराना…
गलतियों पर प्यार से समझाना…
मेरे ज़ख्मों पर मरहम लगाना…
और अपने ज़ख्म छिपा लेना…
मेले में घुमाना…
झूला झुलाना…
बाज़ार ले जाकर मिठाई खिलाना…
अपनी प्लेट का हिस्सा भी चुपके से मुझे दे देना…
बीमार होने पर मीलों दूर कंधे पर बिठाकर डॉक्टर के पास ले जाना…
रात भर मेरे सिरहाने बैठना…
ईद पर नए कपड़े लाना…
अब वो ईद की खुशी कहाँ
अब्बा जो लाते कपड़े, जूते और नई टोपियाँ
और वह साइकिल… जो मेरे लिए किसी हेलीकॉप्टर से कम नहीं थी।
आज भी उनकी चिट्ठियों का हर लफ़्ज़ याद है।
लेकिन अब कौन पुकारता है—
“मेरे नूरे-चश्म… मेरे लख़्ते-जिगर…”
लोग कहते हैं कि पिता का प्यार दिखाई नहीं देता, लेकिन मेरे पिता का प्रेम खुली किताब की तरह था। वे अत्यंत कोमल हृदय इंसान थे। उन्होंने कभी डाँटा नहीं, कभी कठोर शब्द नहीं कहे।
सच कहूँ तो पिता के चेहरे पर अल्लाह का नूर होता है और उनके दिल में कुदरत का सबसे सुंदर शाहकार बसता है। पिता अपने बच्चों के लिए एक मज़बूत ढाल, घना साया, सच्चा गुरु, मार्गदर्शक और सबसे बड़ा सुपरहीरो होता है। उसकी ताक़त चाहे जितनी भी हो, बच्चों के लिए उससे अधिक शक्तिशाली कोई नहीं होता।
कहा जाता है कि अपने भाई-बहनों और माता-पिता के भाई-बहनों से जुड़े रहो, क्योंकि उनमें अपने माता-पिता की बहुत-सी झलक दिखाई देती है।
अल्लाह हमारे माता-पिता और सबके माता पिता पर अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाए, उनकी मग़फ़िरत करे और हमें उनकी सीख पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
सदा खुश रहिए।