एक आदमी, अनेक ज़िंदगियाँ
(एक सच्ची कहानी)
छोटा-सा गाँव। चारों तरफ खेत ही खेत। मीलों बंजर भूमि के बीच बसा यह छोटा-सा गाँव।
बताया जाता है कि इस गाँव में सबसे पहले एक व्यक्ति आए थे, जो ब्रिटिश साम्राज्य की सेना में थे। उन्हें यहाँ का कुछ क्षेत्र अनुदान में दिया गया था। हालाँकि, उस समय यह पूरा इलाका घने जंगल का हिस्सा रहा होगा।
“अकेले ही चले थे जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग मिलते गए, कारवाँ बनता गया।”
कुछ ऐसा ही हुआ। एक अकेले इंसान ने यहाँ आकर अपना डेरा-डंडा डाला। बाद में लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़कर, एक-एक करके बसाया गया। उनमें हर धर्म, हर जाति और हर पेशे के लोग शामिल थे।
उस समय बड़े भू-स्वामियों और ज़मींदारों के पास बहुत अधिक भूमि हुआ करती थी। वे इसी प्रकार नए गाँव बसाया करते थे। प्रारम्भ में लोगों से कोई मुआवज़ा नहीं लिया जाता था। अधिकांश परिवारों को बिल्कुल मुफ़्त में बसाया जाता था। बाद में, जब गाँव आबाद होने लगा, तो संभवतः उनसे कुछ वसूली भी होने लगी होगी।
इन लोगों को रैयत कहा जाता था। रैयत का अर्थ है रिआया, अर्थात प्रजा। ज़मींदार उनसे मालगुज़ारी वसूलते थे। उनका बहुत बड़ा दबदबा होता था। पूरे क्षेत्र में उनका ही अधिकार माना जाता था। उनके हुक्म के बिना कोई काम नहीं होता था।
उनकी हवेलियों में अपनी कचहरियाँ भी होती थीं, जहाँ स्थानीय स्तर पर न्याय-व्यवस्था चलती थी। केवल बड़े मामलों में ही सरकारी न्यायालय का रुख किया जाता था।
यह कहानी ऐसे ही एक गाँव की है, जो क्षेत्रफल में बहुत छोटा था, लेकिन उसमें हर वर्ग और हर जाति के लोग रहते थे। बिना किसी सरकारी योजना के भी गाँव को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से जातीय आधार पर विभाजित किया गया था। जैसे— पठान टोली, जुलाहा टोली, भुईँयाँ टोली, ग्वाल टोली, दुसाध टोली, चमार टोली आदि। अर्थात जिस जाति के लोग जिस क्षेत्र में रहते थे, उस क्षेत्र के नाम के साथ “टोली” जोड़ दिया गया था।
पूरे गाँव का नियंत्रण गाँव के मालिक के हाथ में होता था। किस खेत में कब हल चलेगा, किसकी फसल पहले रोपी जाएगी, किसका धान कब कटेगा, किसके जानवर कहाँ चरेंगे और उन्हें कौन चराएगा— इन सबका निर्णय वही करते थे।
यदि किसी के यहाँ कोई विवाद हो जाता, तो उसे तुरंत बुला लिया जाता कि आज पंचायत होगी। अंतिम निर्णय मालिक का ही होता था। उसके विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर सकता था।
गाँव में यदि कोई नया आदमी दिखाई दे जाता, तो तुरंत लड़कों को भेजकर उसे बुला लिया जाता और पूछताछ शुरू हो जाती। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही उसे जाने दिया जाता।
इन लोगों का अपना एक प्रकार का गुप्तचर तंत्र भी था, जो भीतर की खबरें लाकर देता रहता था।
यदि कोई व्यक्ति इन पर भारी पड़ने लगता, तो सारे दाँव-पेंच ताश के पत्तों और शतरंज की चालों की तरह बिछा दिए जाते। कोशिश केवल यही होती कि किसी भी तरह उसे कमज़ोर कर दिया जाए। इसका सबसे आसान तरीका था— आपस में फूट डाल देना। भाई-भाई में लड़ाई करा देना, बँटवारा करवा देना और एक पूरे खानदान को इस तरह उलझा देना कि फिर दूर बैठकर तमाशा देखा जाए।
भाग–2
कुछ काम तो था नहीं। ज़मीनों से इतना अनाज आ जाता था कि घर का गुज़ारा आराम से हो जाता। उगाही-बगाही से कुछ नगदी मिल जाती। कभी लड़ाई-झगड़े, कोर्ट-कचहरी या सरकारी कामों के नाम पर भी कुछ वसूली हो जाती। खर्च भी आज की तरह अधिक नहीं था। ऊपर से हर तरह के काम करने वाले लोग थोड़ा-सा अनाज लेकर काम कर देते थे।
कुल मिलाकर ऐसा जीवन था कि बस खाया-पिया, मूँछों पर ताव दिया, हाथ में एक डंडा लिया, धोती को कमर में खोंसा और निकल पड़े इधर-उधर। कभी सैर या शिकार का मन हुआ तो घोड़े और बैल गाड़ी या बग्गी का लेकर शिकार के लिए निकाल गए। उस समय लोगों के घरों मे डोली भी हुआ करती थी जिसका कहीं आने जाने के लिए इस्तेमाल मे लाया जाता था जिसे उठाने के लिए कई बेगार लगते थे। अक्सर लोग घूमने टहलने के बड़े शौकीन होते थे हर दिन कहीं न कहीं निकालना होता सैर सपाटे होते रात होती तो घर वापस आते, लौटने पर भोजन तैयार मिलता और देर रात तक राजनीति और दूसरे विषयों पर चर्चाएं होतीं। रेडियो खबरों का मुख्य स्रोत होता था।
घरों में जनानखाना और मर्दाना अलग-अलग होते थे। औरतें तब तक भोजन नहीं करती थीं, जब तक घर के सभी पुरुष भोजन न कर लें। कई बार ऐसा भी होता कि सब्ज़ी या अच्छा भोजन समाप्त हो जाता और उन्हें रूखी रोटी से ही संतोष करना पड़ता।
आमदनी का मुख्य स्रोत खेती ही थी। कुछ लोग बड़े ज़मींदार थे, कुछ मँझोले और कुछ छोटे। किसी के पास पूरे सोलह आने की ज़मींदारी थी, तो किसी के पास आठ आने, चार आने या दो आने का हिस्सा। उस समय एक रुपये में सोलह आने होते थे, इसलिए ज़मींदारी की हैसियत भी इसी आधार पर आँकी जाती थी।
यह गाँव चूँकि सरकार द्वारा इनाम में दिया गया था, इसलिए यहाँ किसी दूसरे ज़मींदार का कोई अधिकार नहीं था। गाँव के वास्तविक मालिक वही थे, जिन्हें यह गाँव पुरस्कारस्वरूप मिला था।
अपनी बराबरी वालों के साथ भी उनका संबंध पूरी तरह कूटनीति पर आधारित होता था। बाकी गाँववासी एक प्रकार से उनके अधीन ही थे।
इसी गाँव में पिछड़े समाज का एक लड़का रहता था। उसके पिता अत्यंत ग़रीब थे। दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी उस समय बहुत कठिन था। किसी के खेतों में मजदूरी करना, किसी की लकड़ियाँ काटना, किसी के जानवर चराना या खेत-खलिहानों की रखवाली करना— यही उस समय की नौकरी मानी जाती थी।
कुछ लोग पुलिस, सेना या छोटी-मोटी सरकारी नौकरियों में थे। उन्हें समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। बाद में ट्रक ड्राइविंग का पेशा भी उभरकर सामने आया। उस समय के युवाओं ने उसमें भी बहुत रुचि ली और अच्छी कमाई की। धीरे-धीरे ट्रक ड्राइवर और मैकेनिक को भी समाज में सम्मानजनक स्थान मिलने लगा।
भाग–3
इसी गाँव में पिछड़े समाज का एक लड़का था, जिसका नाम खालिक था। वह पढ़ने में बहुत होशियार था। उसकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के मकतब से हुई, लेकिन आगे की पढ़ाई में माता-पिता की आर्थिक स्थिति आड़े आ गई। स्कूल की फीस तो नहीं थी, लेकिन कॉपी, किताबें, यूनिफ़ॉर्म और आने-जाने का खर्च कहाँ से आता? मजबूरी में उसके सामने यही रास्ता था कि किसी के खेतों में काम करे, लकड़ियाँ काटे, चरवाहा बने या किसी मालिक की सेवा करके अपना गुज़ारा करे।
खालिक पढ़ाई में तो तेज़ था ही, शरीर और शक्ल-सूरत में भी अपने समाज के अन्य लड़कों से अलग दिखाई देता था। इसी कारण गाँव के बाबू लोगों से उसकी अच्छी बनती थी। उसके साथ वैसा भेदभाव नहीं होता था, जैसा उस समय निम्न वर्ग के अधिकांश लोगों के साथ किया जाता था। वह अक्सर बाबू लोगों के घर ही रहता और परिवार के सदस्य की तरह वहीं खाना भी खाता था।
वह केवल पढ़ने-लिखने में ही तेज़ नहीं था, बल्कि उसका व्यक्तित्व भी अत्यंत आकर्षक था। वह बहुत नेक, ईमानदार और संस्कारी था। उसके माता-पिता भी अपने आप में मिसाल थे। उसके भाई-बहन भी अपने व्यवहार और संस्कारों के कारण सबसे अलग पहचाने जाते थे। सच तो यह था कि ग़रीबी के अलावा उनमें कोई कमी नहीं थी।
कहते हैं, ग़रीबी अक्सर इंसान से उसका हौसला, उसकी उम्मीदें और उसकी सूझ-बूझ छीन लेती है, लेकिन करीमन मियाँ बिल्कुल अलग मिट्टी के इंसान थे। वे किसी से डरते नहीं थे। बड़े-बड़े रंगरूटों को भी अपने तीखे अंदाज़ में खरी-खरी सुना देते थे।
वे शरीर से इतने दुबले-पतले थे कि गाँव के लोग उनकी कद-काठी का मज़ाक उड़ाते रहते थे, जिस पर वे तुरंत भड़क उठते थे। लेकिन उनकी शराफ़त, ईमानदारी और स्वाभिमान ऐसे थे कि अच्छे-अच्छे लोग भी उनका सम्मान करते थे।
जहाँ उनकी टोली के अधिकांश लोग झुककर सलाम करते थे, वहीं करीमन मियाँ का आत्मसम्मान किसी के सामने झुकना नहीं जानता था। वे किसी की धौंस या दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते थे। लोग भले ही उनका मज़ाक उड़ाते रहे हों, लेकिन उनके चरित्र और ईमानदारी ने उन्हें सबके बीच एक अलग पहचान दी। यही संस्कार उनके बच्चों में भी स्पष्ट दिखाई देते थे।
उनके तीन बेटे और दो-तीन बेटियाँ थीं। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही सबकी शादी-ब्याह अच्छे ढंग से कर दिए थे। इसका सबसे बड़ा कारण उनका बड़ा बेटा खालिक था, जिसकी यह कहानी है। आगे चलकर उसने इतनी सफलता प्राप्त की कि केवल अपने परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और अपने रिश्तेदारों के जीवन का स्वरूप बदल दिया।
भाग–4
बड़े बेटे खालिक ने अपनी सूझ-बूझ और व्यवहार से गाँव में एक अलग ही स्थान बना लिया था। गाँव के बाबुओं के साथ ही उसका रहना-सहना था, क्योंकि उनके लड़कों की उम्र भी लगभग उसी के बराबर थी। अब वह उनके साथ दूर स्थित स्कूल भी जाने लगा था।
पढ़ाई के खर्च का भी कुछ प्रबंध हो गया था। बाबुओं का साप्ताहिक हाट लगता था, जहाँ उगाही के लिए खालिक को भेजा जाता। वह पूरे दिन उगाही करता, रसीदें काटता और हिसाब-किताब रखता। बदले में उसे इतना मिल जाता कि उसकी पढ़ाई का खर्च निकल आता। अब उसके पिता को उसकी शिक्षा की अधिक चिंता नहीं रही।
माध्यमिक विद्यालय उत्तीर्ण करने के बाद उसने हाई स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ भी उसने पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया और मैट्रिक की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना आवश्यक था, जो उसकी आर्थिक स्थिति से बाहर की बात थी।
अंततः उसने निश्चय किया कि अब किसी बड़े शहर का रुख करना चाहिए। उस समय यह प्रचलन लगभग नहीं के बराबर था कि कोई निजी नौकरी करने के लिए दूसरे शहर जाए। लोगों की यह धारणा थी कि जो अपने घर-गाँव में कुछ नहीं कर पाता, वही बाहर जाता है। एक प्रकार से बाहर जाकर नौकरी करना विवशता का प्रतीक माना जाता था।
खालिक ने दिल्ली जाने का निर्णय लिया।
दिल्ली पहुँचकर उसने महीनों तक संघर्ष किया। कभी कोई छोटा-मोटा काम मिला, कभी कई-कई दिन बेरोज़गारी में गुज़रे। जीवन कठिनाइयों से भर गया, लेकिन उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। भूख, प्यास, अपमान, विफलता और तिरस्कार— सब कुछ सहते हुए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा।
कभी कहीं रुक जाता, कभी कहीं भोजन मिल जाता, तो कभी बिना खाए ही काम करना पड़ता। इस प्रकार संघर्ष करते-करते कई वर्ष बीत गए। धीरे-धीरे उसने दिल्ली की ज़िंदगी को समझना शुरू कर दिया।
एक दिन वह एक फैक्ट्री में काम कर रहा था। वहाँ आए एक व्यक्ति की नज़र उसकी मेहनत, लगन और ईमानदारी पर पड़ी। वह उससे इतना प्रभावित हुआ कि उसने अपनी पहचान वाली एक कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव दिया।
वह भारत और एक विदेशी कंपनी का संयुक्त उपक्रम (जॉइंट वेंचर) था। वहाँ खालिक को स्टोरकीपर की नौकरी मिल गई। तनख़्वाह भी पहले की अपेक्षा अच्छी थी।
मेहनत और ईमानदारी तो जैसे उसके स्वभाव में ही रची-बसी थी। उसने अपने काम से सबका विश्वास जीत लिया। कुछ ही वर्षों में कंपनी ने उसे पदोन्नति देकर सहायक प्रबंधक बना दिया। अब उसकी आय भी अच्छी हो चुकी थी। कुछ समय बाद उसने पश्चिमी दिल्ली की एक सोसायटी में अपना एक बड़ा घर भी खरीद लिया।
भाग–5
अब गाँव में उनके घर की स्थिति सबसे बेहतर हो चुकी थी। हर किसी का सपना खालिक जैसा बनने का था, मगर किसी में इतना साहस नहीं था कि उसके संघर्ष, परिश्रम और त्याग की बराबरी कर सके।
अब उसने पिता की सारी चिंताओं का भार अपने कंधों पर उठा लिया। माता-पिता, भाई-बहनों— सभी का सीना गर्व से ऊँचा हो गया। धीरे-धीरे उसने अपनी बहनों की शादियाँ कराईं और अपने भाइयों को भी दिल्ली बुला लिया। सबको अपने पैरों पर खड़ा किया और अच्छे कामों में लगा दिया।
वह केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि अपने निकट और दूर— सभी रिश्तेदारों के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं था। उसने अनेक लोगों को दिल्ली बुलाया। कुछ को अपनी फैक्ट्री में काम दिलाया, कुछ को अपनी सिफ़ारिश से दूसरी जगह नौकरी दिलवाई और कुछ के लिए छोटे-मोटे कारखाने स्थापित कराए।
अपने छोटे भाइयों के लिए उसने बड़ी जगह लेकर अलग कारखाना शुरू कराया। इस प्रकार उसने अपने रिश्तेदारों और अपने पूरे पिछड़े समाज को इस तरह आगे बढ़ाया कि सामाजिक उत्थान का ऐसा कार्य बड़े-बड़े उद्योगपति और राजनेता भी शायद ही कर पाए हों।
समय का चक्र निरंतर घूमता रहा और खालिक अपनी मेहनत, ईमानदारी और कौशल से सफलता की नई इबारत लिखता रहा। उसके बच्चे अभी छोटे ही थे। भाई-बहनों और रिश्तेदारों— सभी को वह अपने पैरों पर खड़ा कर चुका था। लेकिन कौन जानता था कि इतना प्यारा इंसान, इतना न्यारा इंसान और इतने बेसहारों का सहारा बनने वाला व्यक्ति एक दिन यूँ अचानक इस दुनिया से विदा हो जाएगा।
एक दिन सुबह-सुबह वह अपनी मोटरसाइकिल से कार्यालय जा रहा था कि एक डीटीसी बस की चपेट में आ गया। देखते ही देखते सब कुछ समाप्त हो गया। वह अपने पीछे रोते-बिलखते अपनों को इस तरह छोड़ गया, मानो अपने जीवन का उद्देश्य पूरा करके ही इस संसार से विदा हुआ हो।
यह एक सच्ची कहानी है।
इस कहानी को लिखते हुए मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। मैंने उन्हें अपनी माँ के सामने एक छोटे-से बालक की तरह हाथ बाँधे खड़े देखा था और मेरी माँ उनके सिर पर शफ़क़त और मुहब्बत से भरा हाथ फेरती जाती थीं।
उस समय मैं छोटा था, लेकिन मेरी माँ ने उनके बारे में जो कुछ बताया, वह आज भी मेरी स्मृतियों में ताज़ा है।
अल्लाह तआला उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फरमाए ( आमीन)
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