बेवक्त की घंटी
आज प्रातः मुझे गाज़ियाबाद से आगे एक कॉलेज में बच्चे के प्रवेश के सिलसिले में जाना था। सुबह का समय किसी नए आरंभ की तरह होता है। घर से बाहर निकलते ही खुली हवा, ठंडी बयार और शांत वातावरण मन में नए विचारों का संचार करने लगते हैं। ऐसे सुखद क्षणों में यदि कोई अप्रत्याशित घटना घट जाए, तो मन अचानक विचलित हो जाता है।
मैं पेट्रोल पंप से पेट्रोल भरवाकर निकला ही था कि यमुना ब्रिज से पहले वाले मोड़ पर ट्रैफिक पुलिस का एक दस्ता दिखाई दिया। उन्होंने मुझे रुकने का संकेत किया और मैं बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बाइक किनारे लगाकर खड़ा हो गया।
“हाँ भाई, लाइसेंस दिखाइए।”
मैंने विनम्रता से कहा, “मेरा लाइसेंस एक्सपायर हो चुका है। नया बनवाने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन अभी तक बन नहीं पाया।”
उन्होंने तुरंत कहा, “फिर तो चालान होगा।”
मैंने निवेदन किया, “साहब, कृपया चालान मत कीजिए। मैंने लाइसेंस बनवाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन प्रक्रिया आसान नहीं रही।”
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “पाँच हजार रुपये का चालान होगा।”
इतना कहकर उन्होंने ई-चालान मशीन में विवरण भरना शुरू कर दिया। मैं समझ गया कि अब चालान कटना लगभग निश्चित है।
मैंने एक बार फिर विनम्रतापूर्वक अपनी बात रखी। इन दिनों लिखने-पढ़ने का अभ्यास बढ़ने के कारण मेरी बातचीत में भी हिंदी की शब्दावली पहले से अधिक आने लगी है। शायद उसी प्रभाव में मैंने अपनी बात पूरी शालीनता से रखी।
उन्होंने कहा, “आधार कार्ड दिखाइए।”
मैंने आधार कार्ड दिखा दिया। अब मुझे पूरा विश्वास हो चुका था कि भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। पहले की तरह सौ-दो सौ रुपये वाले दिन अब नहीं रहे थे।
कुछ ही क्षण बाद उन्होंने चालान की पर्ची मेरे हाथ में थमा दी।
मन ही मन मैंने सोचा, “इसे संभालकर रखूँगा, ताकि यह हमेशा याद दिलाती रहे कि छोटी-सी लापरवाही भी कितनी महँगी पड़ सकती है।”
मैंने बाइक स्टार्ट की। आधुनिक बाइक होने के कारण केवल सेल्फ स्टार्ट का बटन दबाते ही वह चल पड़ी। मुझे अभी लंबा सफर तय करना था और वहाँ पहुँचकर कई औपचारिकताएँ भी पूरी करनी थीं। मन पहले से ही तनाव में था।
यमुना पुल पार करते ही मोबाइल की घंटी बजी। मैंने बाइक सुरक्षित स्थान पर रोककर फोन देखा। नंबर अनजान था। ट्रू-कॉलर पर हिंदी में कोई नाम दिखाई दे रहा था। मैंने सोचा, शायद किसी ग्राहक का फोन होगा।
कॉल उठाते ही सामने वाले ने सलाम किया। आवाज़ कुछ बदली हुई लगी, इसलिए मैं पहचान नहीं पाया।
मैंने भी सलाम का जवाब दिया और कहा, “जी, फरमाइए।”
उन्होंने पूछा, “और सब ख़ैरियत?”
मैंने कहा, “जी, अल्हम्दुलिल्लाह।”
फिर उन्होंने कहा, “और सुनाइए।”
मैं मुस्कुराते हुए बोला, “फोन आपने किया है, इसलिए पहले आपको ही बताना चाहिए कि किस सिलसिले में बात कर रहे हैं।”
इतने में पीछे से एक परिचित आवाज़ सुनाई दी। वह मेरी छोटी बहन की थी। अब मुझे समझते देर नहीं लगी कि यह मेरे छोटे बहनोई थे। उनसे प्रायः हर सुबह बात होती रहती थी और उनका स्वभाव भी थोड़ा हँसमुख और मज़ाकिया है।
मैंने पूछा, “यह नया नंबर कब लिया?”
उन्होंने हँसते हुए कहा, “अभी हाल ही में।”
मैंने भी मुस्कुराकर कहा, “अब तो लगता है इस नंबर से बहुत लोगों के साथ प्रैंक कॉल होंगे।”
वे हँस पड़े। मेरी बात का आशय वे अच्छी तरह समझ गए थे।
मैंने कहा, “अभी मैं रास्ते में हूँ। बाद में आराम से बात करेंगे।”
फोन रखने के बाद मेरी सोच एक अलग दिशा में चल पड़ी।
अभी कुछ देर पहले ही मेरा चालान हुआ था। मैं मानसिक तनाव में था। ऐसे समय यदि कोई केवल मज़ाक करने के उद्देश्य से फोन करे, तो वह व्यक्ति यह नहीं जान सकता कि सामने वाला किस परिस्थिति से गुजर रहा है।
यदि मज़ाक करना ही हो, तो पहले किसी दूसरे माध्यम से यह जान लेना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति बात करने की स्थिति में है भी या नहीं।
हो सकता है—ख़ुदा न करे—वह किसी शोकसभा में बैठा हो, किसी गंभीर समस्या से जूझ रहा हो, किसी महत्वपूर्ण बैठक में हो, किसी ऑनलाइन भुगतान की प्रक्रिया में व्यस्त हो या किसी ऐसे कार्य में लगा हो जहाँ उसका पूरा ध्यान आवश्यक हो। ऐसे समय किया गया एक साधारण-सा मज़ाक भी उसके लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
यहीं से मेरे मन में एक और विचार आया।
यदि हमें किसी के घर भी जाना हो, तो यथासंभव पहले उसे सूचित कर देना चाहिए। संभव है कि वह किसी आवश्यक कार्य में व्यस्त हो, किसी परेशानी से गुजर रहा हो या उस समय मिलने की स्थिति में ही न हो।
मुझे अपनी इस सोच पर संतोष हुआ कि कभी-कभी छोटी-सी घटना भी जीवन की बड़ी सीख दे जाती है। हम अक्सर किसी को साधारण या कम समझदार समझ लेते हैं, जबकि उसकी बातों में भी गहरी बुद्धिमत्ता छिपी हो सकती है। इसलिए किसी को कभी कमतर नहीं समझना चाहिए।
इसी क्रम में मुझे हमारे नबी ﷺ की सुन्नत याद आई। आप ﷺ जब किसी के घर तशरीफ़ ले जाते थे तो पहले इजाज़त लेते थे। यदि अनुमति न मिलती या कोई उत्तर नहीं मिलता, तो वापस लौट आते थे। यहाँ तक कि अपने घर आते समय भी सलाम करके अपनी आमद की सूचना देते, फिर घर में प्रवेश करते थे।
शायद यही कारण है कि इस्लाम हमें केवल इबादत का तरीका ही नहीं सिखाता, बल्कि सामाजिक जीवन जीने का भी श्रेष्ठ सलीका सिखाता है। किसी के घर जाने से पहले इजाज़त लेना, अपनी आमद की सूचना देना, उचित समय का ध्यान रखना, किसी की निजता का सम्मान करना और उसकी मानसिक अवस्था को समझने का प्रयास करना—ये सभी एक सभ्य समाज की पहचान हैं।
कई बार जो बातें हमें बहुत छोटी लगती हैं, वही किसी दूसरे व्यक्ति के लिए बड़ी असुविधा का कारण बन जाती हैं। इसलिए किसी को फोन करने, मज़ाक करने, मिलने जाने या उसके घर अथवा कार्यस्थल पहुँचने से पहले यदि हम केवल एक क्षण रुककर यह सोच लें कि कहीं हमारी यह पहल उसके लिए असुविधाजनक तो नहीं होगी, तो अनेक अनचाही परिस्थितियों से बचा जा सकता है।
दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना भी इबादत का एक रूप है और किसी के सुकून की हिफ़ाज़त करना इंसानियत की सबसे सुंदर पहचान है। अच्छे इंसान केवल वे नहीं होते जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, बल्कि वे भी होते हैं जो छोटी-छोटी बातों में दूसरों के समय, निजता, परिस्थितियों और भावनाओं का सम्मान करना जानते हैं।
हो सकता है मेरी इस सोच में भी कुछ कमियाँ हों, लेकिन इस लेख का उद्देश्य केवल इतना है कि अकस्मात मज़ाक करना, बिना बताए किसी के घर, कार्यस्थल या कार्यालय पहुँच जाना तथा बिना अनुमति किसी के घर में प्रवेश करना—जैसा कि इस्लामी शिक्षाएँ भी मना करती हैं—कई बार दूसरे व्यक्ति के लिए असुविधा और परेशानी का कारण बन सकता है। यदि हम थोड़ा-सा विचार और संवेदनशीलता अपने व्यवहार में शामिल कर लें, तो हमारे रिश्ते अधिक मधुर, सम्मानपूर्ण और सुखद बन सकते हैं।