इंसान की मनोदशा, स्वार्थ और इंसानियत
आप दुनिया की बहुत-सी चीज़ों को समझ सकते हैं, लेकिन इंसान की मनोदशा, उसकी सोच और उसके व्यवहार को पूरी तरह समझ पाना शायद सबसे कठिन कार्यों में से एक है। यह कठिनाई कुछ ऐसी है, जैसे पृथ्वी से सूर्य तक पहुँचने की कल्पना करना।
इंसान बाहर से जितना दिखाई देता है, भीतर से उससे कहीं अधिक जटिल होता है। उसके चेहरे पर दिखाई देने वाली मुस्कान, उसके शब्दों में व्यक्त भावनाएँ और उसका दिखाई देने वाला व्यवहार उसके भीतर की पूरी कहानी नहीं बताते। उसके मन की गहराइयों में न जाने कितने विचार, इच्छाएँ, भय, स्मृतियाँ, अनुभव, आकांक्षाएँ और भावनाएँ एक साथ मौजूद रहती हैं।
कोई डॉक्टर या मनोचिकित्सक यदि यह दावा करे कि वह किसी व्यक्ति के व्यवहार को पूरी तरह समझ सकता है और उसकी मानसिक जटिलताओं का पूर्ण रूप से आकलन कर सकता है, तो शायद यह उसका भ्रम होगा। क्योंकि किसी इंसान की अंतरात्मा की गहराइयों में उतरकर उसके भीतर छिपी हर भावना, विचार, इच्छा और प्रवृत्ति को पूरी तरह जान लेना लगभग असंभव है।
लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मैं मनोचिकित्सा या मनोविज्ञान को नकारता हूँ। मनोविज्ञान मानव मन और व्यवहार को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। बहुत-सी मानसिक अवस्थाओं, व्यवहारगत समस्याओं और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को वैज्ञानिक दृष्टि से समझा और उनका उपचार भी किया जा सकता है। फिर भी इंसान केवल मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का एक संग्रह नहीं है। वह अपने अनुभवों, परिस्थितियों, संस्कारों, संबंधों, इच्छाओं, भय, आकांक्षाओं, स्मृतियों और अपनी विशिष्ट प्रवृत्तियों से मिलकर बना एक अत्यंत जटिल अस्तित्व है।
किसी व्यक्ति के व्यवहार के कुछ पहलुओं को समझा जा सकता है, उसके कुछ व्यवहारों के पीछे संभावित कारणों को खोजा जा सकता है, लेकिन उसकी भीतरी बनावट और उसके वास्तविक स्वभाव का पूर्ण मूल्यांकन करना बहुत कठिन है। परिस्थितियाँ बदलने पर वही व्यक्ति अलग तरह से व्यवहार कर सकता है। कभी-कभी स्वयं इंसान भी अपने भीतर छिपी किसी प्रवृत्ति से पूरी तरह परिचित नहीं होता।
एक भला, शांत और सरल दिखाई देने वाला व्यक्ति भी अपने भीतर ऐसी अनेक बातें छिपाए हो सकता है, जिनके बारे में उसके आसपास के लोग तो क्या, वह स्वयं भी पूरी तरह अनजान हो। उसके मन की किसी गहराई में कोई पुराना अनुभव, कोई अधूरी इच्छा, कोई भय, कोई पीड़ा या कोई ऐसी आकांक्षा दबी हो सकती है, जो किसी विशेष परिस्थिति में अचानक सामने आ जाए।
इंसान के भीतर छिपी इन परतों को जानना कभी-कभी ऐसा हो सकता है, जैसे धरती की गहराई में दबे किसी अनजान खजाने को खोज निकालना—जिसके अस्तित्व का अनुमान तो लगाया जा सकता है, लेकिन उसकी वास्तविकता और गहराई का पता लगाना आसान नहीं होता।
यही इंसान की सबसे बड़ी जटिलता है।
स्वार्थ की सीमा कहाँ समाप्त होती है?
एक इंसान की स्वाभाविक प्रवृत्ति होनी चाहिए कि वह अपने साथ-साथ दूसरों के भले के बारे में भी सोचे और जहाँ तक संभव हो, उनका भला करे। यदि किसी का भला करने की स्थिति में नहीं है, तो कम-से-कम उसका बुरा तो बिल्कुल न करे।
अपने हितों के बारे में सोचना कोई अपराध नहीं है। हर इंसान को अपने जीवन, अपने परिवार, अपनी आवश्यकताओं और अपने भविष्य के बारे में सोचना ही चाहिए। अपने लिए जीना जीवन की आवश्यकता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब मनुष्य अपने स्वार्थ में इतना डूब जाए कि उसे दूसरों के सुख-दुख, अधिकार और सम्मान की कोई चिंता ही न रहे।
केवल अपने हितों के बारे में सोचना और इतना स्वार्थी हो जाना कि अच्छे-बुरे की कल्पना से भी दूर हो जाए—यह एक विचित्र और चिंताजनक स्थिति है।
चलिए, मैं स्वार्थी होने को भी एक सीमा तक जायज़ ठहरा देता हूँ। लेकिन जरा सोचिए, उस व्यक्ति को क्या कहा जाए जो केवल अपने हितों के बारे में ही नहीं सोचता, बल्कि अपने हितों की पूर्ति के लिए दूसरों के दुखों का कारण बन जाता है?
जो किसी दूसरे के अधिकार छीन ले, उसे अपमानित करे, उसकी मजबूरी का लाभ उठाए, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करे या उसकी जिंदगी को कठिन बना दे—उसके स्वार्थ को क्या केवल स्वार्थ कहकर छोड़ दिया जाए?
शायद नहीं।
क्योंकि एक सीमा के बाद स्वार्थ संवेदनहीनता में बदल जाता है और संवेदनहीनता कभी-कभी ऐसे व्यवहार को जन्म देती है, जिसके परिणाम बहुत भयावह हो सकते हैं।
अपराध और उसके पीछे छिपी मानसिकता
इंसान के व्यवहार की जटिलता को समझने के लिए हमें समाज में दिखाई देने वाले विभिन्न अपराधों और उनके पीछे छिपी मानसिकताओं पर भी विचार करना होगा।
कोई व्यक्ति चोरी क्यों करता है? क्या केवल गरीबी उसे चोरी की ओर ले जाती है, या कभी लालच, आदत, अवसर, गलत संगति अथवा बिना मेहनत के पाने की इच्छा भी इसके पीछे होती है?
कोई व्यक्ति बेईमानी क्यों करता है, जबकि वह जानता है कि उसके छल से किसी दूसरे का नुकसान हो सकता है? क्या उस समय उसका स्वार्थ उसके नैतिक विवेक पर हावी हो जाता है?
इसी तरह हिंसा और हत्या जैसे गंभीर अपराधों के पीछे भी हर बार एक ही कारण नहीं होता। कहीं क्रोध और आवेग होता है, कहीं बदला लेने की भावना, कहीं घृणा, कहीं सत्ता या नियंत्रण की इच्छा और कहीं लंबे समय से विकसित हुई हिंसक मानसिकता। कुछ मामलों में व्यक्ति दूसरे मनुष्य के जीवन और उसकी पीड़ा को महत्व देना ही बंद कर देता है।
कुछ लोग दूसरों को प्रताड़ित करने में आनंद लेते हैं। कुछ लोगों को दूसरों को अपने नियंत्रण में रखना अच्छा लगता है। कुछ लोग दूसरों पर रौब जमाने, उन्हें डराने-धमकाने या दबाकर रखने में संतुष्टि महसूस करते हैं। कुछ लोग अपनी शक्ति का प्रदर्शन दूसरों को कमजोर करके करते हैं और कुछ लोग दूसरों की मजबूरी का लाभ उठाने में भी संकोच नहीं करते।
और फिर ऐसे भी अपराध हैं जिनका उल्लेख करना तक मन को विचलित कर देता है—ऐसे घृणित कृत्य जिनमें किसी इंसान की गरिमा, स्वतंत्रता और अस्तित्व तक को कुचल दिया जाता है।
बलात्कार जैसे अपराध को केवल वासना का परिणाम मान लेना भी समस्या को बहुत सीमित कर देना होगा। ऐसे अपराधों में दूसरे व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्रता की अवहेलना, नियंत्रण की मानसिकता, अधिकार जमाने की प्रवृत्ति, स्त्री को मनुष्य के बजाय वस्तु की तरह देखने वाली सोच और सहमति के महत्व को जानबूझकर न मानना जैसी बातें भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन किसी भी परिस्थिति में ऐसे अपराध का दोष पीड़ित पर नहीं डाला जा सकता; अपराध की पूरी जिम्मेदारी अपराध करने वाले की ही होती है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या हर बुरा व्यवहार किसी मानसिक बीमारी का परिणाम होता है?
नहीं।
हर अपराधी मानसिक रूप से बीमार हो, यह आवश्यक नहीं है। कई बार व्यक्ति पूरी तरह जानता है कि वह गलत कर रहा है, फिर भी लालच, अहंकार, बदला, सत्ता, वासना, स्वार्थ, गलत संगति या अपने नैतिक विवेक की उपेक्षा के कारण अपराध का रास्ता चुनता है।
इसलिए अपराध को समझने और अपराध को उचित ठहराने में बहुत बड़ा अंतर है।
किसी अपराध के पीछे छिपी मानसिकता को समझने का उद्देश्य अपराधी को निर्दोष सिद्ध करना नहीं, बल्कि यह समझना होना चाहिए कि मनुष्य की सोच किस बिंदु पर बदलती है, उसका विवेक कहाँ कमजोर पड़ता है और वह दूसरे इंसान की पीड़ा को महसूस करना क्यों बंद कर देता है।
संवेदनहीनता केवल बड़े अपराधों में नहीं होती
इंसान की मानसिकता को समझने के लिए हमेशा बड़े अपराधों का उदाहरण देना आवश्यक नहीं है। कई बार रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाएँ भी बता देती हैं कि किसी व्यक्ति के भीतर दूसरों के प्रति कितनी संवेदना है।
कुछ दिन पहले दिल्ली में बहुत तेज बारिश हुई थी। जगह-जगह पानी भर गया था और खासकर सड़कों पर जलभराव की स्थिति थी। ऐसी परिस्थितियों में वाहन चलाने वाले व्यक्ति का थोड़ा सावधान रहना स्वाभाविक और आवश्यक है, क्योंकि सड़क पर जमा पानी केवल वाहन चलाने वाले के लिए ही नहीं, बल्कि पैदल चलने वालों और आसपास खड़े लोगों के लिए भी परेशानी का कारण बन सकता है।
लेकिन ऐसे समय में भी कुछ लोगों की मानसिकता देखने को मिलती है।
मैं स्वयं ऐसी ही एक घटना का सामना कर चुका हूँ। एक टेंपो चालक ने सड़क पर भरे पानी में अपना वाहन इतनी तेज गति से चलाया कि पानी का पूरा उछाल मेरे शरीर और कपड़ों पर आ पड़ा और मैं पूरी तरह भीग गया। मुझे ऐसा लगा कि उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि उसके कारण किसी दूसरे व्यक्ति को कितनी परेशानी होगी। बल्कि उसके व्यवहार से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उसे इस हरकत में एक तरह का मनोरंजन मिल रहा हो।
मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उसकी इस हरकत पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। लेकिन अपनी गलती स्वीकार करने या माफी माँगने के बजाय वह उल्टा बहस करने लगा।
अब जरा इस घटना को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखिए। किसी व्यक्ति के लिए यह समझना इतना कठिन नहीं है कि सड़क पर जमा पानी में तेज गति से वाहन चलाने से आसपास के लोगों पर पानी पड़ सकता है। फिर भी यदि वह जानबूझकर ऐसा करता है और दूसरे की परेशानी देखकर उसे आनंद मिलता है, तो सवाल केवल यातायात के नियमों का नहीं रह जाता। सवाल उसकी संवेदनशीलता और उसके भीतर मौजूद उस मानसिकता का है, जिसमें दूसरे व्यक्ति की परेशानी उसके लिए कोई विशेष महत्व नहीं रखती।
यह कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं था। किसी की जान नहीं गई, किसी को गंभीर चोट नहीं लगी। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि इसमें इंसानियत का कोई प्रश्न ही नहीं है?
मेरे विचार से नहीं।
इंसानियत की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि हम किसी बड़े अवसर पर कितना बड़ा उपकार करते हैं। उसकी असली परीक्षा तो उन छोटे-छोटे क्षणों में होती है, जब हमारे पास किसी दूसरे को तकलीफ देने या उससे बचाने—दोनों में से किसी एक को चुनने का अवसर होता है।
एक और छोटी-सी घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
एक व्यक्ति मोटे पाइप से अपने घर के सामने सड़क धो रहा था। उसी समय एक छोटी बच्ची हाथ में जग लिए उसके पास पहुँची और पानी माँगने लगी। वह बच्ची शायद अपने लिए या अपने घर के लिए थोड़ा-सा पानी चाहती थी। लेकिन उस व्यक्ति ने उसे पानी देने से साफ इनकार कर दिया और पाइप से लगातार पानी बहाकर सड़क धोता रहा।
जरा सोचिए—एक ओर पानी इतनी मात्रा में सड़क पर बहाया जा रहा था और दूसरी ओर एक छोटी बच्ची कुछ पानी के लिए खड़ी थी।
यहाँ फिर वही प्रश्न सामने आता है—मनुष्य के भीतर ऐसी कौन-सी मानसिकता होती है कि उसके सामने किसी की छोटी-सी आवश्यकता भी दिखाई नहीं देती?
हो सकता है उस व्यक्ति के पास पानी देने का कोई अपना कारण रहा हो। हो सकता है वह किसी विशेष परिस्थिति में ऐसा करने को विवश रहा हो। इसलिए केवल एक घटना के आधार पर उसके पूरे चरित्र का निर्णय करना उचित नहीं होगा। आखिर, जैसा मैंने पहले कहा, इंसान के भीतर क्या चल रहा है, उसे पूरी तरह जान पाना आसान नहीं है।
लेकिन इस घटना से एक महत्वपूर्ण बात पर विचार जरूर किया जा सकता है—हमारे भीतर दूसरों की जरूरत को महसूस करने की क्षमता कितनी है?
कभी-कभी किसी की मदद करने के लिए हमें धन की आवश्यकता नहीं होती। केवल थोड़ी-सी संवेदना चाहिए होती है।
एक गिलास पानी, किसी के लिए कुछ मिनट का समय, किसी परेशान व्यक्ति के लिए दो सहानुभूतिपूर्ण शब्द, किसी बुजुर्ग को सड़क पार कराने में मदद, किसी भूखे को भोजन या किसी बेसहारे को थोड़ा-सा सहारा—इनमें से किसी के लिए भी हमें बहुत बड़ा त्याग नहीं करना पड़ता। लेकिन सामने वाले के लिए उसका महत्व बहुत बड़ा हो सकता है।
इंसान के भीतर की दूसरी दिशा
लेकिन इंसान के भीतर केवल स्वार्थ, क्रूरता और संवेदनहीनता ही नहीं होती। उसी इंसान के भीतर करुणा, दया, प्रेम, सहानुभूति और सेवा की भावना भी मौजूद होती है।
किसी बीमार की सेवा करने में जो संतोष मिलता है, वह किसी वस्तु को खरीदने से मिलने वाले सुख से अलग होता है।
किसी भूखे को खाना खिलाना, किसी जरूरतमंद को वस्त्र देना, किसी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की सहायता करना, किसी निराश व्यक्ति को हिम्मत देना, किसी बेसहारे का सहारा बनना या किसी ऐसे व्यक्ति के काम आना जिसे वास्तव में आपकी जरूरत है—इन कार्यों का प्रतिफल हमेशा धन या किसी बाहरी पुरस्कार के रूप में नहीं मिलता, लेकिन इनके बाद मन के भीतर जो संतोष पैदा होता है, वह बहुत गहरा होता है।
कभी किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराकर देखिए। किसी परेशान इंसान की समस्या हल करने का प्रयास करके देखिए। किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ थामकर देखिए जो स्वयं को बिल्कुल अकेला महसूस कर रहा हो। शायद तब आप महसूस करेंगे कि मदद करने वाला केवल सामने वाले की सहायता नहीं करता, बल्कि स्वयं भी भीतर से समृद्ध हो जाता है।
और यह करुणा केवल मनुष्यों तक सीमित क्यों रहे?
किसी प्यासे पशु को पानी पिला देना, किसी भूखे जानवर को भोजन दे देना या किसी घायल जीव के प्रति संवेदना दिखाना भी हमारे भीतर एक ऐसी संतुष्टि पैदा कर सकता है, जिसे केवल भौतिक उपलब्धियों से प्राप्त करना संभव नहीं।
शायद यही मनुष्य के भीतर मौजूद दो अलग-अलग दिशाएँ हैं—एक दिशा हमें अपने स्वार्थ में इतना डुबो सकती है कि हम दूसरों का दुख देखने से भी इंकार कर दें, और दूसरी दिशा हमें अपने से बाहर निकलकर किसी दूसरे के दुख को समझने और कम करने की प्रेरणा देती है।
आखिर इंसान होने का अर्थ क्या है?
शायद इंसान होने का वास्तविक अर्थ केवल यह नहीं है कि हमारे पास बुद्धि है, हम बोल सकते हैं, सोच सकते हैं और अपने लिए कुछ हासिल कर सकते हैं।
इंसानियत शायद वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम यह समझना शुरू करते हैं कि जिस तरह हमें अपना सुख प्रिय है, उसी तरह दूसरे को भी अपना सुख प्रिय है; जिस तरह हमें अपमान अच्छा नहीं लगता, दूसरे को भी नहीं लगता; जिस तरह हमें पीड़ा होती है, दूसरे को भी होती है।
अपने लिए जीना जीवन की आवश्यकता है, लेकिन दूसरों के अस्तित्व और अधिकारों का सम्मान करते हुए जीना सभ्यता है। और जब हम किसी दूसरे के दुख को कम करने के लिए अपने समय, श्रम, धन या सुविधा का कुछ हिस्सा देने को तैयार होते हैं, तब हम केवल किसी दूसरे की मदद नहीं कर रहे होते—हम अपने भीतर की इंसानियत को भी जीवित रख रहे होते हैं।
धन, पद, प्रतिष्ठा और सफलता मनुष्य को समाज में ऊँचा स्थान दे सकते हैं, लेकिन उसके भीतर की इंसानियत ही उसे वास्तव में बड़ा बनाती है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि हमने जीवन में कितना पाया।
हमे खुद से यह सवाल करना चाहिए की हमारे होने से किसी दूसरे को क्या मिला।
अगर हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आई, किसी का दुख थोड़ा कम हुआ, किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद मिली, किसी जरूरतमंद को सहारा मिला या किसी बेजुबान जीव को राहत मिली—तो शायद यही हमारे जीवन की उन उपलब्धियों में से है, जिनका मूल्य समय भी कम नहीं कर सकता। क्योंकि मनुष्य होना जन्म से मिलता है, लेकिन इंसानियत हमारे कर्मों से दिखाई देती है।