बढ़ती उम्र और बरसात का मौसम – बचपन की भीगी यादें

बढ़ती उम्र और बरसात का मौसम बचपन की भीगी यादें।

आज सुबह मैंने ChatGPT से केवल इतना पूछा था—”दिल्ली का मौसम कैसा रहेगा?”

उसने उत्तर दिया, “आज बारिश होने की संभावना है। कहीं-कहीं तेज़ बारिश, बिजली चमक सकती है और वातावरण में नमी रहेगी।”

मैंने सहज ही दूसरा प्रश्न किया, “क्या मैं वॉक पर जा सकता हूँ?”

उसका उत्तर पढ़कर मैं कुछ क्षणों के लिए ठिठक गया।

उसने लिखा—”नहीं, मैं आपको बाहर जाने की सलाह नहीं दूँगा। आपकी आयु 58 वर्ष है और आपको उच्च रक्तचाप भी है। बेहतर होगा कि आज आप घर पर ही हल्की स्ट्रेचिंग और व्यायाम कर लें।”

मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्या तुम मुझे डरा रहे हो?”

उसने उत्तर दिया, “नहीं, मैं आपको डरा नहीं रहा, केवल सचेत कर रहा हूँ।”

उसके बाद वह अपनी बात समझाने लगा, लेकिन मेरे मन में उसकी बातों का जो प्रभाव पड़ा, वह बिल्कुल अलग था। मैं अचानक कई दशक पीछे, अपने बचपन के गाँव पहुँच गया।

मैंने अपनी पुस्तक “भूली बिखरी यादें” में बरसात का विस्तार से वर्णन किया है। हमारे लिए बरसात केवल बादलों से गिरने वाली पानी की बूंदें नहीं थीं। वह उम्मीद थी, जीवन था, धरती की मुस्कान थी। सूखी पड़ी धरती को प्रकृति का ऐसा उपहार, जिसके बिना खेती अधूरी थी और शायद जीवन भी।

आज जब बरसात की खबर सुनकर लोग ट्रैफिक जाम, जलभराव और मोबाइल पर मौसम का अलर्ट देखते हैं, तब मुझे अपना बचपन याद आता है, जब पहली बारिश की खबर पूरे गाँव के चेहरे पर मुस्कान बनकर उतरती थी।

नदियाँ, नहरें, तालाब, पोखर और खेत पानी से ऐसे भर जाते थे, मानो समुद्र ने अपना रास्ता बदलकर गाँव की ओर रुख कर लिया हो। चारों तरफ़ पानी ही पानी दिखाई देता था। गाँव के लड़कों की टोलियाँ घंटों तालाबों और पोखरों में डुबकियाँ लगाती रहती थीं। छोटे-छोटे बच्चे कागज़ की नाव बनाकर गलियों में बहते पानी में छोड़ देते और उसके पीछे-पीछे दौड़ते। कुछ शरारती बच्चे बारिश में उछल-कूद करते, भीगते और अपने पैरों से पानी उछालकर एक-दूसरे को भिगोते।

किसी शायर ने कितनी सुंदर बात कही है—

“कोई मेरा सब कुछ ले ले, मगर लौटा दे मेरे बचपन के वो दिन।”

शायद यह केवल एक पंक्ति नहीं, हम सबकी अधूरी इच्छा है।

शहरों में पले-बढ़े बच्चों ने शायद बरसात को उस रूप में कभी देखा ही नहीं होगा, जिस रूप में गाँव के बच्चे देखते थे। उनके लिए बारिश छुट्टी या ट्रैफिक की समस्या हो सकती है, लेकिन हमारे लिए वह त्योहार से कम नहीं थी।

पहली काली घटाएँ आसमान पर छातीं और पूरा गाँव जैसे एक साथ जाग उठता। लोग अपने-अपने घरों से ऐसे निकल पड़ते मानो किसी सैनिक को सीमा पर भेजा जा रहा हो। किसी के हाथ में खंती होती, किसी के कंधे पर फावड़ा, कोई कुदाल उठाए तेज़ी से खेतों की ओर भाग रहा होता। हर चेहरे पर उत्साह होता, क्योंकि सब जानते थे कि प्रकृति ने काम शुरू कर दिया है, अब हमारी बारी है।

उस समय बैलों की जोड़ी किसी पशु भर का नाम नहीं थी। वे किसान के परिवार का हिस्सा थे। लोग उन्हें ऐसे निहारते जैसे कोई कमाऊ बेटा लंबे समय बाद विदेश से घर लौटा हो। उनकी बड़ी-बड़ी बड़ी शांत और प्राकृतिक काजलों से भरी आँखों में एक अजीब अपनापन होता था। ऐसा लगता था मानो वे अपने मालिक से कह रहे हों—”चलो, अब काम शुरू करें।” हम तुम्हारे साथ हैं।

जब उनके कंधों पर हल और जुआठ रखा जाता, तो वह दृश्य आज भी मेरी आँखों के सामने ताज़ा हो उठता है। लगता था जैसे घर का कोई जिम्मेदार सदस्य पूरे परिवार का भार अपने कंधों पर उठाने निकल पड़ा हो।

गाँव में अच्छे बैलों की चर्चा भी किसी सम्मानित व्यक्ति की तरह होती थी। लोग दूर-दूर से उन्हें देखने आते। उनकी चाल, उनकी ताकत, उनका स्वभाव—सब पर बातें होतीं। कोई कहता, “देखो, क्या सीधी चाल है!” कोई कहता, “इससे अच्छा हल कोई नहीं खींचता।” किसान के चेहरे पर वह गर्व साफ़ दिखाई देता था।

लेकिन हर बैल ऐसा नहीं होता था। कुछ बैल बेहद आलसी होते। हमारे इलाके में ऐसे बैलों को लोग “कोढ़िया बैल” कहा करते थे। यह उस समय का ग्रामीण मुहावरा था, जिसका प्रयोग कामचोर या निकम्मे स्वभाव के लिए किया जाता था। बेचारा किसान लाख समझाए, पुचकारे या डाँटे, वह बैल अपनी मर्जी से ही चलता। तब लोग कहते, “यह तो कोढ़िया बैल है।”

आज सोचता हूँ तो लगता है, उस समय किसान का दर्द भी कितना गहरा रहा होगा। जिस तरह कोई माँ-बाप अपनी निकम्मी संतान को देखकर चिंता में डूब जाते हैं, लगभग वैसी ही चिंता किसान को अपने निकम्मे बैल को देखकर होती होगी। क्योंकि उसकी मेहनत, उसका भविष्य और उसके परिवार की रोटी कहीं-न-कहीं उसी पर निर्भर थी।

आज तकनीक ने बहुत कुछ बदल दिया है। ट्रैक्टरों ने बैलों की जगह ले ली, मौसम की जानकारी मोबाइल पर मिलने लगी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हमें यह बताने लगी कि कब बाहर निकलना सुरक्षित है। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ कहीं पीछे छूट गई—प्रकृति से वह आत्मीय रिश्ता, जो हमारे बचपन की सबसे बड़ी दौलत था।

दिल्ली में बारिश का दूसरा दिन था। सुबह-सुबह वॉक पर जाना आसान नहीं था। ChatGPT ने भी मुझे बाहर न जाने की सलाह दी थी, लेकिन मैं खुद को बढ़ती उम्र की कैद में नहीं रखना चाहता था। मैं फिर से अपने बचपन को जी लेना चाहता था। बारिश लगातार हो रही थी और मैं बिना छतरी के यमुना किनारे दूर तक टहलता रहा। बारिश की ठंडी-ठंडी बूंदें मेरे ऊपर  पड़ रही थीं और मैं उन्हें उसी आनंद से महसूस कर रहा था, जैसे कभी अपने गाँव में किया करता था। कुछ पल के लिए ऐसा लगा, मानो मेरी उम्र नहीं, केवल मेरा बचपन मेरे साथ चल रहा हो।

समय बदल गया है, साधन बदल गए हैं, जीवन की गति बदल गई है, लेकिन बचपन की वे बरसातें आज भी मेरे भीतर उसी तरह जीवित हैं, जैसे कल की ही बात हो।

अपने दिमाग़ से केवल आसान काम मत लीजिए। https://authorejazkhan.in/2026/07/08/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%bc-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b2-%e0%a4%86%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95/

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