मुज्जन मियां की इज्ज़त का फालूदा
सुबह का समय था। घर में सब अभी भी सोए हुए ही थे कि अचानक मुज्जन मियां ने अपनी बेगम को आवाज़ लगाई—
“बेगम! अरी ओ बेगम! क्या सोती ही रहोगी या उठोगी भी?”
मियां खुद मुँह ही मुँह में कुछ बड़बड़ा रहे थे। बार-बार गर्दन इधर-उधर लपकाकर कुछ ढूंढ रहे थे। इतने में उनकी बेगम भारी-सा मुँह लेकर आ पहुँचीं।
“क्या है? क्यों सुबह-सुबह मोहल्ले में एलान किए जा रहे हो?”
मुज्जन मियां झुके-झुके ही गर्दन ऐसे मोड़ बैठे कि पूरा शरीर वहीं रहा मगर गर्दन बकरे की तरह पीछे घूम गई। अगले ही पल जोर की चीख मारी—
“अरे अल्लाह! मर गया! मेरी गर्दन टूट गई!”
और बस, फिर क्या था। दर्द से ज्यादा गुस्सा बेगम पर उतरा।
“अजी तुम्हें कुछ होश भी है? दिन कहाँ चढ़ आया और तुम सब हो कि घोड़े-गधे बेचकर ऐसे सो रिया हो जैसे अब रात दोबारा आएगी ही ना! अच्छे घरों की यही पहचान होवे है क्या? कोई भला आदमी आ जावे और सारे घर वाले यूँ पड़े मिलें तो क्या कहवेगा?”
उधर बेगम की आँख अभी ठीक से खुली भी न थी। ऊपर से मियां जी की जली-कटी बातें सुनकर वो भी भड़क उठीं।
“तुम्हारी तरह क्या सारे घर वाले उल्लू हैं? सारी रात कभी इधर तो कभी उधर करवटें बदलते रहो। और सुबह तड़के से पहले ही चाय की ऐसी हुड़क उठे है कि पूरा घर सिर पर उठा लो। तुम क्या समझो, मैं कोई बहरी हूँ? मुझे सब पता रहवे है तुम कब क्या करो हो!”
मुज्जन मियां को यह बात ऐसी बुरी लगी कि अभी सीधे खड़े भी न हो पाए थे कि झटके से उठे… और अगले ही पल—
“हाय अल्लाह!”
चीख मारते हुए फर्श पर फैल गए।
बेगम घबरा गईं।
“अजी क्या हुआ? कुछ परेशान दिखो हो। बी.पी. की दवा टेम से ले रहे हो ना?”
मुज्जन मियां धीरे-धीरे उठकर बैठ गए, मगर अभी भी हाथों से इधर-उधर कुछ टटोल रहे थे।
बेगम बोलीं—
“अब क्या खो गया? कुछ बोलोगे भी?”
“अरी मैं अपना चश्मा ढूंढूं हूं। यहीं रहवे था ससुरा… पता नहीं कहाँ दफान हो गया!”
बेगम ने माथा पकड़ लिया।
“तुम होश में तो हो?”
मियां झल्लाए—
“क्यों? मैं तुझे बेहोश दिख रहा हूं?”
बेगम बोली—
“अपने सर पे देखो।”
मुज्जन मियां ने जैसे ही हाथ ऊपर रखा, चश्मा वहीं टिका मिला।
बेगम हँसी रोकते हुए बोली—
“जब से पूरा घर सिर पे उठाए घूम रहे हो, चश्मा तब से सर पे ही बैठा है।”
मुज्जन मियां खीझते हुए बोले—
“तुझे ज्यादा दिखाई देवे है तो पहले ही बता दिया होता! मैं कब से ढूंढने लग रहा हूं!”
बेगम बोली—
“अच्छा चलो ये बताओ, बुलाया क्यों था?”
अब मुज्जन मियां खुद चौंक गए। सचमुच भूल ही गए थे कि बुलाया क्यों था।
तभी उनकी नजर हाथ में पकड़ी काले रंग की पुरानी पैंट पर गई।
बेगम देखते ही भड़क पड़ीं—
“अरे ये पैंट यहाँ कैसे आई? मैं तो इसे पुराने कपड़ों वाले को देने के लिए छुपाकर रखी थी!”
मुज्जन मियां तुरंत बोले—
“देखो जी, मैंने तुमसे पहले भी कहा है मेरे कपड़े कबाड़ी को मत दिया करो। घर में पुराने कपड़े ही पहनूंगा।”
असल में मुज्जन मियां की आदत थी कि पुराने कपड़े चुपचाप निकालकर अपने कमरे में कहीं छुपा देते ताकि बेगम की नजर न पड़े।
लेकिन आज जो होने वाला था, वो तो खुद मुज्जन मियां ने सपने में भी न सोचा था।
उन्होंने पैंट उठाकर पीछे की तरफ दिखाई—
“अरे देखो तो सही! इसका पीछे का हिस्सा कहाँ चला गया? सच-सच बताओ, तुमने काटे तो नहीं? कोई पोछा-वोछा बनाया होगा!”
बेगम बोलीं—
“मैं पोछा क्यों बनाती? मैंने तो इसे महीनों से देखा तक नहीं!”
मुज्जन मियां सोच में पड़ गए।
“हूँ… तुम ठीक कह रही हो। मैं तो इसे रोज सुबह मॉर्निंग वॉक में पहनकर जाया करूं हूं। लेकिन ताज्जुब है… ये फटी कैसे? और फटी भी तो ऐसी कि पीछे से बिल्कुल नंगा कर दिया!”
इतना कहते ही अचानक उन्हें कल सुबह का सारा मंज़र याद आ गया।
जब वो मॉर्निंग वॉक से लौट रहे थे तो लोग उन्हें पीछे से देखते… फिर आगे निकलकर दोबारा पीछे मुड़-मुड़कर देखते। कुछ लोग चोरी-छुपे हँस भी रहे थे।
तब मुज्जन मियां सोच रहे थे—
“वाह भाई वाह! लगता है आज भी हमारी पर्सनैलिटी का जलवा कायम है!”
लेकिन अब समझ आया कि लोग उनकी पर्सनैलिटी नहीं… पैंट की “वेंटिलेशन व्यवस्था” देख रहे थे।
मियां मारे शर्म के गड़े जा रहे थे।
सोचने लगे—
“हद हो गई! आदमी तो आदमी… वो औरतें और लड़कियाँ भी मुझे पलट-पलट कर देखे थीं। तभी मैं सोचूं आज सब इतना मुस्कुरा क्यों रहे थे!”
बेगम अब ताने के पूरे मूड में आ चुकी थीं।
कहा था ना ! कि पेंट काफी पुरानी हो चुकी है अब इसे मत पहनो।
कभी बात भी मान जाया करो। हमेशा अपनी ही चलाया करो हो। देख लिया नतीजा? बात मानने में भलाई होवे है। नहीं तो ऐसे ही खुलेआम लोग हँसी उड़ावेंगे।”
बेचारे मुज्जन मियां अब भी अपनी कमर के नीचे ऐसे हाथ फेर रहे थे जैसे अभी भी अपनी इज्ज़त ढंकने की कोशिश कर रहे हों।