ताज़गी केवल सब्ज़ियों में नहीं, विचारों में भी होनी चाहिए
सब्जी की ताज़गी केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी सोच और जीवनशैली को भी प्रभावित करती है। आज मैं गुरुग्राम से लौट रहा था। रास्ते में एक सब्ज़ी की दुकान दिखाई दी। वहाँ सजी हुई सब्ज़ियों की ताज़गी ने मुझे अपनी ओर आकर्षित कर लिया। सड़क अपरिचित थी और उसकी हालत इतनी दयनीय थी कि उस पर वाहन चलाना तो दूर, पैदल चलना भी कठिन लग रहा था।
मैं उस दुकान से कुछ दूर निकल चुका था, लेकिन उन सब्ज़ियों की ताज़गी ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने अपनी मोटरसाइकिल वापस मोड़ ली और सब्ज़ी वाले के पास पहुँच गया। पता नहीं क्यों, दिल्ली से लगभग चालीस किलोमीटर दूर आकर भी मैं वहीं से सब्ज़ियाँ खरीदने के लिए तैयार हो गया।
आजकल यदि सब्ज़ियाँ और फल अत्यधिक ताज़े और चमकदार दिखाई दें, तो सहज ही उन पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। आधुनिक कृषि और भंडारण में प्रयुक्त कुछ रसायनों के कारण वे कई दिनों तक खेत की ताज़गी जैसी दिखाई दे सकती हैं। इसलिए केवल बाहरी चमक देखकर उन्हें पूरी तरह ताज़ा मान लेना उचित नहीं है। बेहतर यही है कि फल और सब्ज़ियों को उपयोग करने से पहले अच्छी तरह धोया जाए और कुछ समय के लिए स्वच्छ पानी में भिगो दिया जाए, ताकि यदि उन पर किसी प्रकार के रासायनिक अवशेष हों तो उनका प्रभाव कुछ कम हो सके।
सब्ज़ी बेचने वाला युवक कम उम्र का था, लेकिन अत्यंत परिश्रमी और संस्कारी प्रतीत हो रहा था। उसकी बातचीत और विचारों ने मुझे सब्ज़ियों की ताज़गी से भी अधिक प्रभावित किया। उसने गेरुए रंग की शर्ट पहन रखी थी। रंग साँवला था, लेकिन चेहरे पर आत्मविश्वास, विनम्रता और संतोष स्पष्ट झलक रहा था। मैंने अपने बैग में जितनी सब्ज़ियाँ आ सकती थीं, उतनी खरीद लीं और उससे बातचीत भी करता रहा।
मुझे उससे यह पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ी कि वह कहाँ का रहने वाला है। उसकी बोली और व्यवहार से मुझे एक अनुमान हो गया था। फिर भी मैं जानता था कि किसी व्यक्ति से सीधे उसके क्षेत्र के बारे में पूछना कई बार उसे असहज कर सकता है। यह भी एक विडंबना है कि हमारे समाज में कई लोग अपनी पहचान को लेकर सहज महसूस नहीं करते। कभी-कभी “बिहारी” जैसे शब्द, जो केवल एक भौगोलिक पहचान होने चाहिए, लोगों के बीच उपहास या ताने के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। यह केवल एक शब्द का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक सोच का प्रश्न है।
बिहार ने वर्षों तक अनेक सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया है। अवसरों की कमी, शिक्षा का असमान प्रसार, जातिगत भेदभाव, सामाजिक विषमता और विकास की धीमी गति ने वहाँ के लाखों लोगों को रोज़गार की तलाश में अपने घर-परिवार से दूर जाने के लिए विवश किया। उन्होंने देश के लगभग हर राज्य में खेतों, कारखानों, निर्माण स्थलों, दुकानों और विभिन्न उद्योगों में कठिन परिश्रम किया। अनेक लोगों ने संघर्ष के साथ-साथ अपमान और पूर्वाग्रह भी झेले। गरीबी अक्सर इंसान को वह सब सहने पर मजबूर कर देती है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती।
यह भी उतना ही सत्य है कि बिहार भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और शैक्षिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। विश्वविख्यात नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय, भगवान बुद्ध और महावीर की कर्मभूमि तथा अनेक महान विद्वानों और समाज सुधारकों की परंपरा इसी भूमि से जुड़ी है। इसलिए किसी भी प्रदेश का मूल्यांकन केवल उसकी वर्तमान चुनौतियों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
बातचीत के दौरान उस युवक ने स्वयं बताया कि वह बिहार के बेतिया ज़िले का रहने वाला है। उसने पश्चिम चंपारण और आसपास के क्षेत्रों का भी उल्लेख किया। फिर उसने मुस्कुराते हुए कहा कि उसके इलाके से बहुत से “क्रिमिनल” निकलते हैं।
उसकी यह बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। वह इसे ऐसे कह रहा था मानो यह किसी उपलब्धि का विषय हो। सामान्यतः लोग अपने क्षेत्र का परिचय देते समय वहाँ के डॉक्टरों, इंजीनियरों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, प्रशासनिक अधिकारियों, खिलाड़ियों या साहित्यकारों का उल्लेख गर्व से करते हैं। लेकिन यदि किसी समाज में अपराधियों का नाम भी सम्मान या गौरव के साथ लिया जाने लगे, तो यह केवल एक व्यक्ति की सोच का नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता का प्रश्न बन जाता है।
कुछ समय पहले तक अनेक क्षेत्रों में ऐसे लोगों का प्रभाव देखने को मिलता था जिन्हें स्थानीय भाषा में “रंगदार” या “दबंग” कहा जाता था। वे अपने भय और शक्ति के बल पर लोगों से रंगदारी वसूलते थे। फ़िल्मों में भी ऐसे किरदार अक्सर दिखाई देते रहे हैं। समाज में उनका ऐसा आतंक होता था कि सामान्य व्यक्ति उनके सामने तो क्या, उनके पीछे भी कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पाता था।
यह प्रवृत्ति केवल अपराध तक सीमित नहीं है। जहाँ शक्ति और प्रभाव का असंतुलन होता है, वहाँ लोग अन्याय का विरोध करने से हिचकते हैं। कई बार लोग सत्य जानते हुए भी मौन रह जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने नुकसान का भय होता है। यही मौन धीरे-धीरे अन्याय को और अधिक शक्तिशाली बना देता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि जब तक समाज में गलत कार्य करने वालों को यह एहसास नहीं होगा कि उनका कार्य शर्मनाक, अनैतिक और समाज के लिए हानिकारक है, तब तक वे अपने अपराधों पर गर्व करते रहेंगे। कोई भू-माफिया, कोई डॉन, कोई तस्कर या नशे का अवैध कारोबार करने वाला व्यक्ति स्वयं को प्रभावशाली और सफल समझता रहेगा। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब समाज का एक वर्ग भी ऐसे लोगों को सम्मान देने लगे।
वास्तविक सम्मान धन, भय या बाहुबल से नहीं, बल्कि ईमानदारी, परिश्रम, ज्ञान, सेवा और श्रेष्ठ चरित्र से प्राप्त होता है। जिस समाज में अपराधी सम्मान पाने लगें और सज्जन लोग उपेक्षित होने लगें, वहाँ नैतिक पतन निश्चित है।
असल सुधार केवल कानून से नहीं, बल्कि मानसिकता बदलने से आता है। जब समाज स्वयं अच्छे और बुरे के बीच का अंतर भूलने लगता है, तब अराजकता जन्म लेती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हर गलत कार्य की स्पष्ट शब्दों में निंदा करें और सही कार्य करने वालों का सम्मान बढ़ाएँ। यदि समाज की सोच बदल जाएगी, तो अपराधी भी अपने कृत्यों पर गर्व करने के बजाय शर्म महसूस करेंगे।
सब्ज़ियों की ताज़गी ने मुझे उस दुकान तक पहुँचाया था, लेकिन वहाँ से लौटते समय मेरे मन में एक और विचार ताज़ा हो चुका था—समाज को केवल ताज़ी सब्ज़ियों की नहीं, बल्कि ताज़े, स्वस्थ और नैतिक विचारों की भी उतनी ही आवश्यकता है। क्योंकि जब विचार शुद्ध होते हैं, तभी समाज भी स्वस्थ और सभ्य बनता है।