ग़रीबी की कीमत

“गरीबी इंसान से क्या नहीं करवा देती!”

एक माँ का ऐसा त्याग, जिसे देखकर आज भी मन भर आता है

ग़रीबी की कीमत: एक माँ का ऐसा त्याग

यह वाक्य हम अक्सर सुनते हैं, परंतु इसकी वास्तविक पीड़ा वही समझ सकता है जिसने स्वयं गरीबी देखी हो या उसे बहुत निकट से महसूस किया हो।

बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को दिन में दो वक्त की रोटी और तन ढकने के लिए कपड़ा मिल जाए तो उसकी गरीबी समाप्त हो गई। किंतु वास्तविकता इससे कहीं अधिक कठोर है। मनुष्य केवल पेट भरने के लिए नहीं जीता। उसके जीवन में सम्मान, शिक्षा, उपचार, सुरक्षा, बच्चों का भविष्य, रहने के लिए एक सुरक्षित घर और छोटी-छोटी अनगिनत आवश्यकताएँ भी होती हैं। जब इन आवश्यकताओं का अभाव होता है, तब मनुष्य स्वयं को असहाय, विवश और कई बार अपमानित भी महसूस करता है।

ग़रीबी क कीमत

निर्धनता केवल जेब को खाली नहीं करती, बल्कि धीरे-धीरे मनुष्य का आत्मविश्वास, उसके सपने, उसका हुनर, उसकी मुस्कान और जीवन जीने का उत्साह भी छीन लेती है। अनेक लोग पूरी उम्र संघर्ष करते-करते इस संसार से विदा हो जाते हैं। उनके हृदय में बस एक ही अधूरी इच्छा रह जाती है—

“काश! जो मैं अपने जीवन में न बन सका, मेरी आने वाली पीढ़ियाँ वह बन जाएँ। उन्हें वह जीवन मिले, जिसकी मैंने केवल कल्पना की थी।”

किसी शायर ने शायद ऐसे ही लोगों के लिए कहा है—

“मैं तो इस खानाबदोशी में भी खुश हूँ,

मगर अगली नस्लें तो न भटकें, उन्हें एक घर भी देना।”

यह केवल एक शेर नहीं, बल्कि करोड़ों गरीब परिवारों के जीवन का सबसे बड़ा सपना है।

ग़रीबी की कीमत

यदि हम अपने आसपास ध्यान से देखें तो समाज का एक कठोर और पीड़ादायक चेहरा दिखाई देता है। ऐसे असंख्य लोग हमारे बीच रहते हैं जो अपनी आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कभी किसी के सामने अपना दुःख व्यक्त नहीं करते। वे चुपचाप अपने संघर्षों का बोझ उठाते रहते हैं। उनकी तकलीफ़ें न किसी समाचार की सुर्खियाँ बनती हैं और न ही किसी की चर्चा का विषय।

यदि हम समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, दलितों, पिछड़े समुदायों और बेसहारा लोगों के जीवन का गंभीरता से अध्ययन करें, तो सामाजिक विषमता का वास्तविक स्वरूप हमारे सामने आ जाएगा। यद्यपि संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार दिए हैं और पिछले दशकों में परिस्थितियों में उल्लेखनीय सुधार भी हुआ है, फिर भी सामाजिक भेदभाव की अनेक दीवारें आज भी पूरी तरह नहीं टूटी हैं।

धर्म के आधार पर भेदभाव, जाति का भेद, ऊँच-नीच की मानसिकता, रंग-रूप का भेद, अमीरी-गरीबी का अंतर और न जाने कितने प्रकार की असमानताएँ आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं। यही कारण है कि अनेक परिवार पीढ़ियों से संघर्ष करते चले आ रहे हैं।

आज मैं कोई कहानी नहीं सुना रहा हूँ। मैं अपने जीवन की एक ऐसी सच्ची घटना साझा कर रहा हूँ, जिसे मैंने बहुत निकट से देखा और महसूस किया। इस घटना ने मुझे गरीबी का वह चेहरा दिखाया, जिसकी कल्पना केवल किताबें पढ़कर नहीं की जा सकती।

कहानियों और समाचारों में हम अक्सर दर्दनाक घटनाएँ पढ़ते हैं। कुछ लोग विपरीत परिस्थितियों के सामने टूट जाते हैं, उनका साहस जवाब दे देता है और वे निराशा में ऐसे कदम उठा लेते हैं जिनका परिणाम अत्यंत दुखद होता है। लेकिन दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हों, धैर्य नहीं खोते। वे संघर्ष करते हैं, समाधान खोजते हैं और समय के साथ अपने जीवन को बदलने का प्रयास करते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि—

“समय चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, वह कभी स्थिर नहीं रहता।”

दिल्ली में एक अनजान परिवार

ग़रीबी की कीमत: संघर्ष की असली कहानी

यह घटना उन दिनों की है जब मैं अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक इलाके में किराए के मकान में रहता था।

एक दिन अचानक उसी मकान में एक नया परिवार आकर रहने लगा। परिवार में पति-पत्नी और उनकी कई बेटियाँ थीं। बातचीत से पता चला कि वे बिहार के किसी छोटे से गाँव के रहने वाले थे।

शुरू-शुरू में हमने यही सोचा कि शायद परिवार का मुखिया रोजगार की तलाश में दिल्ली आया होगा। हालाँकि सामान्यतः ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति नौकरी की तलाश में पूरे परिवार को साथ लेकर आए। अधिकतर लोग पहले स्वयं आते हैं, काम मिलने और परिस्थितियाँ अनुकूल होने के बाद परिवार को बुलाते हैं।

नया शहर, नए लोग और नई परिस्थितियाँ—किसी भी व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने में समय तो लगता ही है।

दो-तीन दिनों में उस परिवार की महिला और उसकी बेटियों का हमारे घर आना-जाना शुरू हो गया। कभी नमक चाहिए होता, कभी चीनी, कभी कोई छोटी-मोटी घरेलू वस्तु। भारतीय समाज में पड़ोसियों के बीच ऐसा लेन-देन अपनत्व की एक सहज परंपरा रही है। धीरे-धीरे परिचय बढ़ा और बातचीत का सिलसिला भी शुरू हो गया।

दिन बीतते गए, लेकिन एक बात ने हमारा ध्यान बार-बार अपनी ओर खींचा।

परिवार का पुरुष शायद ही कभी कमरे से बाहर निकलता था। वह अधिकांश समय घर के भीतर ही रहता—कभी चुपचाप बैठा हुआ, तो कभी लेटा हुआ। इसके विपरीत उसकी पत्नी और बेटियाँ रोज़ सुबह बाहर निकल जातीं और शाम तक लौटतीं।

घर का वातावरण सामान्य दिखाई देता था। समय पर भोजन बनता, सब मिलकर खाते, बच्चे हँसते-खेलते और घर में उनकी चहल-पहल बनी रहती। ऊपर हमारे कमरे तक उनकी बातचीत और बच्चों की खिलखिलाहट साफ़ सुनाई देती थी।

एक और बात अक्सर ध्यान आकर्षित करती थी। लगभग हर दिन उनके घर से मछली या चिकन पकने की खुशबू आती। यह देखकर मन में कई प्रश्न उठते।

हम आपस में चर्चा करते—

“यह आदमी कहीं काम पर जाता नहीं, फिर घर कैसे चलता होगा?”

“मकान का किराया, रोज़ का खर्च, बच्चों की ज़रूरतें… यह सब कैसे पूरा होता होगा?”

पहली नज़र में ही यह स्पष्ट हो जाता था कि परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है। उनके कपड़े, रहन-सहन और जीवन-शैली सब कुछ उनकी सीमित परिस्थितियों की कहानी कह रहे थे। फिर भी उनके चेहरे पर वैसी घबराहट या बेचैनी दिखाई नहीं देती थी, जैसी आमतौर पर बेरोज़गारी के दिनों में दिखाई देती है।

सबसे अधिक जो बात मुझे प्रभावित करती थी, वह थी उनकी बेटियों का अपने पिता के प्रति आदर और स्नेह।

वे समय पर उन्हें भोजन देतीं, चाय बनाकर लातीं और छोटी-छोटी बातों का पूरा ध्यान रखतीं। उनकी माँ जब भी घर से निकलती, लगभग रोज़ एक ही बात दोहराती—

“बेटा, पापा का ध्यान रखना। समय पर खाना खिला देना… दवा देना… और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेना।”

बेटियाँ बिना किसी बहस के माँ की हर बात मानतीं। उनके व्यवहार में अनुशासन भी था और संस्कार भी।

उन्हें देखकर सहज ही महसूस होता था कि अभावों के बीच भी माता-पिता ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए हैं। गरीबी ने उनके घर से साधन छीन लिए थे, लेकिन परवरिश की गरिमा नहीं छीन सकी थी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। धीरे-धीरे यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। अब हमने भी उनके जीवन के बारे में अधिक सोचना छोड़ दिया था।

ग़रीबी की कीमत

लेकिन एक दिन ऐसा हुआ जिसने हमारी सारी धारणाएँ बदलकर रख दीं।

दोपहर का समय था। घर के बाहर एक ऑटो आकर रुका। मेरी पत्नी ने खिड़की से बाहर झाँका। देखा कि वही महिला बड़ी मुश्किल से ऑटो से उतर रही थी। उसके चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी। वह बेहद कमजोर और थकी हुई दिखाई दे रही थी। उसकी बेटियाँ उसे सहारा देकर धीरे-धीरे कमरे तक ले जा रही थीं।

पहली नज़र में लगा कि शायद उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई है। हमने अधिक पूछना उचित नहीं समझा। केवल हालचाल पूछा और वह अपने कमरे में चली गई।

उस दिन उसकी बेटियाँ असामान्य रूप से शांत थीं। सुबह जो माँ बिल्कुल स्वस्थ होकर घर से निकली थी, शाम को उसी को इस हालत में देखकर उनके चेहरों पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

रात तक उसकी तबीयत कुछ संभली। तब वह मेरी पत्नी के पास आई और बातचीत के दौरान उसने बताया—

“आज मैं अपोलो अस्पताल गई थी। वहाँ कई जाँचें हुईं। सुबह से शाम हो गई। बहुत गर्मी थी… मैं पूरी तरह थक गई हूँ।”

मेरी पत्नी से रहा नहीं गया। उसने सहज ही पूछ लिया—

“तुम यहाँ इलाज कराने आई हो? अपोलो तो बहुत महँगा अस्पताल है। अगर इलाज कराना ही था तो एम्स या सफदरजंग जैसे सरकारी अस्पताल भी जा सकती थीं। आखिर ऐसी कौन-सी बीमारी है?”

मेरी पत्नी का यह प्रश्न सुनकर वह कुछ क्षण चुप रही।

फिर उसने जो बताया, उसे सुनकर हम दोनों स्तब्ध रह गए।

एक माँ का निर्णय

ग़रीबी की कीमत : ग़रीबी का वास्तविक अर्थ

मेरी पत्नी के प्रश्न का उत्तर देने से पहले वह कुछ क्षण तक चुप रही। उसकी आँखें झुकी हुई थीं, मानो वह अपने भीतर उमड़ते भावों को शब्द देने का साहस जुटा रही हो।

फिर उसने धीमे स्वर में कहना शुरू किया—

“मैं यहाँ अपना इलाज कराने नहीं आई हूँ। जिन लोगों के घर मैं काम करती हूँ, उन्हीं के साथ अस्पताल गई थी। वे लोग पास ही एक फ्लैट में रहते हैं। दिल्ली में रहने, खाने और अन्य ज़रूरतों का पूरा खर्च भी वही लोग उठा रहे हैं।”

वह कुछ पल रुकी, फिर बोली—

“मेरे मालिक की दोनों किडनियाँ खराब हो चुकी हैं। बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। डॉक्टरों ने अब केवल एक ही रास्ता बताया है—किडनी प्रत्यारोपण। उन्हें एक डोनर की ज़रूरत थी।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“वे मदद के बदले अच्छी-खासी रकम देने को तैयार थे।”

ग़रीबी की कीमत

यह कहते हुए उसने एक लंबी साँस ली और फिर बोली—

“मेरी दो बेटियाँ जवान हो चुकी हैं। उनकी शादी की चिंता मुझे दिन-रात खाए जा रही थी। मेरे पति की आमदनी इतनी नहीं कि एक साथ इतना पैसा जुटा सकें। घर की हालत आप देख ही रहे हैं। ऐसे में मुझे लगा कि शायद ऊपरवाले ने मेरे लिए यही रास्ता चुना है।”

उसकी बात सुनकर हम दोनों कुछ क्षण तक बिल्कुल निःशब्द बैठे रहे।

उस समय उसके चेहरे पर न कोई शिकायत थी, न किसी से कोई गिला। वहाँ केवल एक माँ की चिंता थी—अपनी बेटियों के भविष्य की चिंता।

धीरे-धीरे हमारी समझ में आने लगा कि पिछले कई सप्ताह से जो कुछ हम देख रहे थे, उसके पीछे कितनी बड़ी कहानी छिपी हुई थी।

अब हमें यह भी समझ में आ गया कि उसका पति दिनभर घर से बाहर क्यों नहीं निकलता था। वह स्वयं भी शारीरिक रूप से कमजोर था और परिवार की परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि पत्नी ने उसे किसी भी जोखिम से दूर रखा था।

उस महिला के मन में अपने पति के प्रति जो सम्मान और समर्पण था, वह भी मुझे गहराई से छू गया।

वह स्वयं इतनी बड़ी शारीरिक पीड़ा सहने जा रही थी, लेकिन उसकी चिंता अपने लिए नहीं थी। घर से निकलते समय वह रोज़ अपनी बेटियों से यही कहती—

“पापा का समय पर ध्यान रखना। खाना खिला देना। दवा देना। उन्हें किसी बात की तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए।”

दर्द से कराहती हुई अवस्था में भी उसकी पहली चिंता अपने पति और बच्चों की ही रहती।

उस दिन मुझे पहली बार यह महसूस हुआ कि त्याग का सबसे बड़ा रूप शायद माँ ही होती है।

वह अपने हिस्से का सुख, अपना स्वास्थ्य, अपनी इच्छाएँ और कभी-कभी अपने शरीर का हिस्सा तक परिवार की खुशियों पर न्योछावर कर देती है।

कुछ दिनों बाद वह दिन भी आ गया, जब उसे अस्पताल में भर्ती होना था।

घर से निकलते समय उसकी बेटियाँ उसे ऐसे देख रही थीं जैसे किसी अनजाने भय ने उनके मन को घेर लिया हो। वह उन्हें बार-बार समझा रही थी—

“घबराना मत… मैं जल्दी वापस आ जाऊँगी।”

लेकिन उसके चेहरे की थकान और आँखों की नमी बता रही थी कि वह स्वयं भी भीतर से पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी।

कुछ दिन तक वह दिखाई नहीं दी।

घर का वह कमरा, जहाँ से बच्चों की आवाज़ें आया करती थीं, असामान्य रूप से शांत हो गया था। बेटियाँ पहले की तरह घर का काम करतीं, पिता की देखभाल करतीं और चुपचाप अपने दिनों को काटती रहतीं।

फिर एक दिन वह वापस लौटी।

मैंने उसे देखा तो पहचानना कठिन हो रहा था।

चेहरा पीला पड़ चुका था। शरीर बेहद कमजोर हो गया था। चलने में भी उसे कठिनाई हो रही थी।

मेरी पत्नी कुछ पूछती, उससे पहले ही उसने धीमे स्वर में कहा—

“ऑपरेशन हो गया… मैंने अपनी एक किडनी दे दी है।”

यह कहते समय उसके चेहरे पर न गर्व था, न पछतावा।

बस एक गहरी थकान थी।

उसने आगे कहा—

ग़रीबी की कीमत :

“जो रकम मिली है, उसी से अपनी दोनों बेटियों की शादी करूँगी। रिश्ते पहले से तय हैं। बस पैसों की कमी थी। अब शायद ऊपरवाले ने वह कमी भी पूरी कर दी।”

उसकी आँखों में उस समय जो संतोष था, उसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

उसने अपने शरीर का एक अमूल्य हिस्सा खो दिया था, लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि अब उसकी बेटियों का घर बस सकेगा।

उस दिन पहली बार मैंने महसूस किया कि कुछ लोग अपने बच्चों की  खुशियाँ खरीदने के लिए केवल पैसा ही खर्च नहीं करते, बल्कि अपना सब कुछ बेचकर अपनों की खुशियाँ खरीदते हैं।

ग़रीबी की कीमत

विदाई, जिसने बहुत कुछ सिखा दिया अदा कर दिया उसने अपनी ग़रीबई की कीमत

समय के साथ उसकी तबीयत में थोड़ा-बहुत सुधार होने लगा। शरीर पहले जैसा तो नहीं रहा था, लेकिन अब वह धीरे-धीरे चल-फिर लेती थी। कुछ दिनों बाद मैंने देखा कि वह अपनी बेटियों के साथ बाज़ार जाने लगी है। कभी कपड़े खरीदती, कभी बर्तन, कभी बिस्तर और कभी विवाह में काम आने वाला कोई अन्य सामान।

उसके हाथों में खरीदारी के थैले होते थे, लेकिन मुझे बार-बार ऐसा लगता था कि उन थैलों में केवल सामान नहीं, बल्कि एक माँ के त्याग की कहानी भरी हुई है।

बच्चे नए कपड़े देखकर प्रसन्न हो जाते। उनके चेहरों पर भविष्य के सुनहरे सपने दिखाई देते थे। शायद उन्हें भी पूरी तरह यह एहसास नहीं था कि उनकी मुस्कान के पीछे उनकी माँ ने कितना बड़ा मूल्य चुकाया है।

कुछ ही दिनों में विवाह की लगभग सारी तैयारियाँ पूरी हो गईं।

फिर वह दिन भी आ गया, जब उन्हें अपने गाँव लौटना था।

सुबह-सुबह घर के बाहर सामान रखा जाने लगा। दो बड़े सूटकेस, कुछ थैले और कई छोटे-बड़े पैकेट। बच्चे नए कपड़े पहने हुए थे। उनके पैरों में नए जूते थे। उनके चेहरों पर घर लौटने की खुशी साफ़ दिखाई दे रही थी।

उन्हें देखकर कोई भी यही कहता कि यह एक साधारण परिवार, जो शादी के सामान की तैयारी करके अपने गाँव लौट रहा है।

लेकिन मैं जानता था कि उन सूटकेसों में रखा हर सामान केवल पैसों से नहीं खरीदा गया था।

उनमें एक माँ का त्याग, उसका दर्द और उसके शरीर का एक अनमोल हिस्सा भी शामिल था।

उस परिवार को विदा करते समय मन बहुत देर तक उदास रहा।

उस घटना ने मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर किया कि गरीबी केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह मनुष्य को ऐसे निर्णय लेने पर विवश कर देती है, जिनकी कल्पना भी सामान्य परिस्थितियों में नहीं की जा सकती।

कई बार गरीबी इंसान से उसका बचपन छीन लेती है, कई बार उसकी शिक्षा, उसके सपने और उसका आत्मसम्मान। और कभी-कभी उससे उसके शरीर का एक हिस्सा भी छीन लेती है।

समय बीतता गया।

कुछ वर्षों बाद किसी परिचित से उस महिला के बारे में जानकारी मिली। पता चला कि ऑपरेशन के बाद वह कभी पूरी तरह स्वस्थ नहीं रह सकी। अक्सर बीमार रहने लगी थी। यह सुनकर मन फिर भारी हो गया।

यह भी सुनने में आया कि जिस व्यक्ति का किडनी प्रत्यारोपण हुआ था, वह भी कुछ महीनों बाद इस संसार से विदा हो गया।

उस दिन मन में एक ही विचार बार-बार उठता रहा—

जीवन का कोई मूल्य धन से नहीं चुकाया जा सकता।

धन आवश्यक है, लेकिन वह अमरता नहीं खरीद सकता। वह सुविधाएँ दे सकता है, पर जीवन की गारंटी नहीं दे सकता।

ग़रीबी की कीमत: उस घटना ने मुझे एक और सत्य सिखाया।

हम प्रायः अपने जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों को बहुत बड़ा समझ लेते हैं। कभी धन की कमी का दुःख, कभी किसी वस्तु के न मिलने की शिकायत, कभी दूसरों से तुलना। लेकिन जब ऐसे लोगों का जीवन सामने आता है, तब समझ में आता है कि हमारी अनेक शिकायतें वास्तव में शिकायतें हैं ही नहीं।

आज भी जब उस माँ का चेहरा याद आता है, तो उसकी वही आवाज़ कानों में गूँजती है—

“पापा का ध्यान रखना… समय पर खाना खिला देना…”

वह स्वयं असहनीय पीड़ा से गुजर रही थी, फिर भी उसकी पहली चिंता अपने पति और बच्चों की थी।

शायद इसी का नाम मातृत्व है।

माँ अपने हिस्से का सुख छोड़ सकती है, अपनी इच्छाओं का त्याग कर सकती है, अपने शरीर की पीड़ा सह सकती है, लेकिन अपने बच्चों के भविष्य के साथ समझौता नहीं कर सकती।

मैं नहीं जानता कि उस परिवार की आज क्या स्थिति है। बेटियाँ कैसी हैं, उनका जीवन कैसा चल रहा है, वह माँ आज इस दुनिया में है या नहीं। लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ कि उसने मुझे जीवन का एक ऐसा पाठ पढ़ाया, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता।

उस दिन मुझे समझ में आया कि वास्तविक समृद्धि धन से नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, संतुष्ट मन और अपनों के साथ से होती है।

यदि हमारा शरीर स्वस्थ है, हम अपने पैरों पर चल सकते हैं, अपने हाथों से काम कर सकते हैं और अपने परिवार के साथ दो पल सुकून से बैठ सकते हैं, तो यकीन मानिए—हम इस संसार के सबसे धनी लोगों में हैं।

इसलिए हमें हर दिन अपने पालनहार का शुक्र अदा करना चाहिए।

स्वास्थ्य सबसे बड़ी दौलत है, संतोष सबसे बड़ा वैभव है और इंसानियत सबसे बड़ी विरासत।

ग़रीबी की कीमत यूं भी चूकते हैं कुछ लोग।

सब्जी की ताज़गी और सोच

सामाजिक कल्याण

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