अंधेरी रात का डर
यह काफ़ी पुरानी और विशाल इमारत थी। कभी इसमें एक स्कूल चला करता था। उसके प्रिंसिपल एक ईसाई व्यक्ति थे। कहा जाता था कि इसी स्कूल में उनकी हत्या कर दी गई थी। तभी से इमारत का वह हिस्सा लगभग बंद ही रहता था। हालाँकि इमारत के दूसरे भाग में लोग रहते थे, मगर उस ओर कोई नहीं जाता था। लोगों के मन में उस जगह को लेकर गहरा भय था।
जब मन में डर और वहम घर कर जाए, तो साधारण-सी बातें भी असाधारण लगने लगती हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सुनसान रास्ते से गुजर रहा हो और उसके मन में यह विचार आ जाए कि कोई उसका पीछा कर रहा है, तो कुछ ही देर बाद उसे पेड़ की परछाई भी किसी इंसान जैसी दिखाई देने लगती है। ठीक ऐसा ही उस इमारत के बारे में भी था।
एक बार संध्या नाम की एक महिला उस ओर कपड़े फैलाने गई। वहाँ उसके साथ कुछ ऐसा हुआ कि डर के मारे उसकी तबीयत बिगड़ गई।
पिछले कई वर्षों से दिलावर अपने परिवार के साथ उसी इमारत में रहता आ रहा था। लेकिन उसने कभी कुछ असामान्य नहीं देखा था और न ही उसके परिवार ने। फिर भी लोग तरह-तरह की बातें करते थे। कोई कहता कि उस हिस्से में किसी की परछाई दिखाई देती है, तो कोई दावा करता कि वहाँ कोई अदृश्य शक्ति रहती है।
एक बार कोई व्यक्ति उस ओर गया तो अगले दिन बेहोश मिला। हालाँकि इसके पीछे किसी साज़िश की भी संभावना हो सकती थी, लेकिन उस समय कोई निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता था। कभी किसी को लंबी-सी परछाई दिखाई देती, कभी काली बिल्ली अचानक नज़र आती और पल भर में गायब हो जाती। कभी किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई देती।
कुल मिलाकर डर का ऐसा माहौल बन चुका था कि पूरा इलाका उस रास्ते से गुजरने से कतराता था। दिन में लोग किसी तरह निकल भी जाते, लेकिन रात होते ही अधिकांश लोग अपना रास्ता बदल लेते थे।
एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि पूरा मोहल्ला हैरत में पड़ गया। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब आखिर हो क्या रहा है। वह आवाज़ कहाँ से आती थी और किसकी थी, इसका कोई उत्तर किसी के पास नहीं था। डर के कारण कोई भी उस ओर जाने का साहस नहीं करता था।
पूरी रात रुक-रुककर तरह-तरह की आवाज़ें आती रहीं। कभी चूड़ियों की खनक सुनाई देती, तो कभी किसी के धीमी आवाज़ में बातें करने की। पूरा माहौल रहस्यमय और भयावह हो गया था।
इमारत के उस हिस्से में न बिजली थी और न ही कोई सफ़ाई होती थी। बड़े-बड़े हॉलों में पुराने सामान, स्कूल की मेज़ें और कुर्सियाँ बिखरी पड़ी थीं। सभी कमरों और हॉलों पर मज़बूत ताले लगे हुए थे। इसलिए किसी के भीतर होने की संभावना लगभग असंभव लगती थी।
दिन बीतने के साथ उन आवाज़ों का सिलसिला और बढ़ने लगा। ऐसा लगता था मानो रात के अँधेरे में कोई पीछे की ओर से इमारत में प्रवेश करता हो। कुछ देर तक खुसर-पुसर होती, फिर सब कुछ शांत हो जाता।
अब तक किसी ने इस रहस्य की तह तक जाने की हिम्मत नहीं की थी। आखिर कौन अपनी शामत अपने सिर लेता? लोग आवाज़ें सुनते, एक-दूसरे से चर्चा करते और फिर रोज़ की तरह अनसुना करके अपने-अपने घर लौट जाते।
लेकिन रोशनी को यह बात बिल्कुल भी हज़म नहीं हो रही थी। उसे पूरा विश्वास था कि मामला कुछ और ही है। वह सोचती, “यह किसी इंसान की आवाज़ है। पिछले कई दिनों से कोई न कोई उस हिस्से में रह रहा है, और वह अकेला भी नहीं है। उसके साथ और लोग भी हैं।”
एक रात उसने साहस जुटाया और उस बंद दरवाज़े के पास जाकर कान लगा दिया। अंदर से दूध पीते एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी। कोई औरत उसे गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी। थोड़ी देर के लिए बच्चा शांत हो जाता, लेकिन कुछ ही क्षण बाद फिर रोने लगता।
यह सुनकर रोशनी भी घबरा गई। इतनी भीषण गर्मी में, बिना बिजली और बिना पंखे के कोई इंसान वहाँ कैसे रह सकता था? यह सोचकर ही उसका मन बेचैन हो उठा।
अब यह बात पूरी इमारत में चर्चा का विषय बन गई। फिर भी अधिकांश लोगों ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। आखिर वह कोई छोटी-मोटी इमारत नहीं थी, बल्कि पूरा एक मोहल्ला था।
वह सुनसान और डरावना हिस्सा रोशनी के कमरे के बिल्कुल पास था। इसलिए सबसे अधिक परेशानी उसी के परिवार को हो रही थी। ऊपर से रोशनी स्वभाव से बहुत दयालु और संवेदनशील थी। वह किसी की तकलीफ़ देखकर चुप नहीं रह सकती थी।
उसने फिर हिम्मत की और एक बार दोबारा उसी बंद दरवाज़े के पास पहुँची। इस बार भी वही बच्चे के रोने की आवाज़… वही किसी औरत का उसे चुप कराना…
लेकिन इस बार उसे ऐसा महसूस हुआ मानो अंदर किसी का दम घुट रहा हो। बच्चे के रोने की आवाज़ और भी तेज़ हो गई थी। रोशनी से रहा नहीं गया। उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई—
“कौन है अंदर? जल्दी दरवाज़ा खोलो, नहीं तो मैं पुलिस को बुलाती हूँ!”
लेकिन दरवाज़ा कैसे खुलता? बाहर से तो उस पर बहुत बड़ा ताला लगा हुआ था।
यह बात पूरी तरह उसकी समझ से बाहर थी। फिर भी अब उसने ठान लिया था कि चाहे जो हो जाए, इस रहस्य का पर्दाफाश करके ही रहेगी।
वह लगातार आवाज़ लगाती रही और ऐसा जताने लगी जैसे उसे अंदर मौजूद लोगों के बारे में सब कुछ पता हो।
“मैं सब जानती हूँ… तुम लोग कौन हो और यहाँ कैसे आए हो।”
हालाँकि वास्तव में उसे कुछ भी पता नहीं था।
फिर उसने नरम स्वर में कहा—
“जो भी हो, बाहर आ जाओ। अंदर बहुत गर्मी है और बिजली भी नहीं है। कोई अनहोनी हो जाएगी। देखो, हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं। बस इतना बताओ कि तुम कौन हो और अंदर कैसे पहुँचे?
अंदर से कुछ हलचल होने लगी। ऐसा लगा जैसे कोई डरते-डरते बोलने की कोशिश कर रहा हो।
“जी… जी…”
रोशनी ने फिर आवाज़ लगाई, “कौन हो तुम?”
भीतर से धीमी-सी आवाज़ आई, “मैं… शामी।”
रोशनी चौंक गई।
“शामी? तुम यहाँ क्या कर रही हो?”
“मुझे… मेरे पति यहाँ लाए हैं।”
“पति यहाँ लाए हैं? तो तुम्हारे पति कहाँ हैं?”
कुछ क्षण चुप रहने के बाद भीतर से उत्तर मिला, “वो… बाहर गए हैं।”
रोशनी ने फिर पूछा, “पहले यह बताओ कि तुम अंदर पहुँची कैसे?”
शामी ने घबराते हुए कहा, “जी… उधर पीछे की तरफ़ से…”
यह सुनते ही रोशनी चौंक पड़ी। उसे तो यह भी मालूम नहीं था कि इमारत के पीछे से भी कोई रास्ता है।
वह तुरंत दौड़कर पीछे की ओर गई।
उधर रोशनी का पति दिलावर भी घर लौट आया था। उसने देखा कि रोशनी घर में नहीं है। पहले उसने इधर-उधर आवाज़ लगाई, फिर सोचा कि शायद किसी पड़ोसी के घर गई होगी। तभी बाहर से रोशनी की आवाज़ सुनाई दी। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी से लगातार बातें कर रही हो।
दिलावर उसी दिशा में दौड़ पड़ा।
लेकिन वहाँ पहुँचकर उसे रोशनी तो दिखाई दी, पर दूसरी ओर कोई नज़र नहीं आया।
अंधेरी रात का डर अब सबके मन में घर कर चुका था।
दिलावर ने चारों ओर नज़र दौड़ाई और ज़ोर से पुकारा, “रोशनी… कहाँ हो तुम?”
रोशनी ने जवाब दिया, “मैं इधर हूँ।”
आवाज़ सुनकर दिलावर उस ओर बढ़ा। लेकिन जिस हिस्से की ओर वह जा रही थी, वहाँ जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था। उसके मन में अचानक भय समा गया। उसे लगा जैसे कहीं कोई भूत-प्रेत या आत्मा रोशनी को अपने वश में तो नहीं कर चुकी।
वह घबराकर उसी ओर दौड़ा।
पास पहुँचकर उसने देखा कि रोशनी दीवार पर चढ़ी हुई है और किसी से बातें कर रही है। लेकिन दिलावर को दूसरी ओर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
उसका डर और बढ़ गया। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि रोशनी किससे बात कर रही है।
भय ने उसके मन पर ऐसा अधिकार कर लिया कि वह असामान्य व्यवहार करने लगा। उसका चेहरा पीला पड़ गया, शरीर काँपने लगा और वह घबराहट में उल्टी-सीधी हरकतें करने लगा। ऐसा लग रहा था मानो डर ने उसकी मानसिक स्थिति पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया हो।
उधर रोशनी ने जब अपने पति की यह हालत देखी तो वह भी घबरा गई। वह तुरंत दीवार से उतरकर उसके पास पहुँची और उसे संभालने लगी। उसकी आवाज़ सुनकर इमारत के कुछ और लोग भी वहाँ आ गए।
सभी ने मिलकर किसी तरह दिलावर को संभाला। थोड़ी देर बाद जब उसकी हालत कुछ सामान्य हुई तो उसे घर ले जाया गया।
इसके बाद रोशनी ने सबको बताया, “इस बंद हिस्से के अंदर एक औरत और उसके दो बच्चे हैं।”
पहले तो किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। लेकिन वह बार-बार दीवार के ऊपर बनी खुली जगह की ओर इशारा करके कहती रही कि वहीं से कोई अंदर गया है।
आख़िर कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाई। वे दीवार पर चढ़े और अंदर झाँककर देखा।
जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर सब स्तब्ध रह गए।
सचमुच अंदर एक औरत अपने दो छोटे बच्चों के साथ सहमी हुई बैठी थी।
यह देखकर सबके होश उड़ गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी ऊँची दीवार पार करके वह औरत दो बच्चों के साथ उस बंद इमारत के अंदर कैसे पहुँची होगी।
किसी तरह लोगों ने उन्हें बाहर निकाला और रोशनी के घर ले आए।
उनकी हालत इतनी खराब थी कि ऐसा लगता था मानो कई दिनों से उन्होंने ठीक से खाना, पानी और आराम कुछ भी न किया हो।
अंधेरी रात का डर — अब सच्चाई से पर्दा उठने का समय आ चुका था
सबसे पहले उस औरत और उसके दोनों बच्चों को पानी पिलाया गया। उन्हें कूलर के सामने बैठाया गया ताकि उनकी हालत कुछ सामान्य हो सके। तेज़ गर्मी और कई दिनों की परेशानी ने उन्हें पूरी तरह निढाल कर दिया था। उन्हें सामान्य करना ही उस समय सबसे बड़ी चुनौती थी।
उधर लोगों की उत्सुकता अपने चरम पर थी। कोई भी वहाँ से जाने को तैयार नहीं था। सब जानना चाहते थे कि आखिर इस रहस्यमय घटना के पीछे की सच्चाई क्या है।
कुछ देर बाद जब उस औरत की तबीयत में थोड़ा सुधार हुआ, तो उसने धीमे स्वर में अपनी आपबीती सुनानी शुरू की।
“हम लोग दूसरे प्रदेश से यहाँ आए हैं। इस शहर में हमारा कोई परिचित नहीं था। मकान की तलाश में मेरे पति इधर-उधर भटक रहे थे। तभी एक दलाल मिला। उसने यही मकान दिखाया और कहा कि फिलहाल यहीं ठहर जाइए।”
भीड़ में से किसी ने पूछा, “अगर उसी ने मकान दिलाया था, तो चाबी क्यों नहीं दी?”
औरत ने जवाब दिया, “उसने कहा था कि मकान की चाबी मालिक के पास है और वे अभी शहर से बाहर गए हैं। उसने भरोसा दिलाया कि बस एक रात की बात है। पीछे की तरफ़ से अंदर चले जाइए, कल तक चाबी मिल जाएगी।”
कुछ क्षण रुककर उसने भारी आवाज़ में कहा—
“लेकिन आज तीसरा… नहीं, चौथा दिन हो गया है। उस आदमी का अब तक कोई पता नहीं चला।”
यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। अब तक जिस जगह को लोग भूत-प्रेत का अड्डा समझ रहे थे, वहाँ एक असहाय परिवार कई दिनों से भूख, गर्मी और डर के बीच जीवन बिताने को मजबूर था।
भीड़ में से किसी ने पूछा, “तुम्हारे पति कहाँ हैं?”
“जी… वो किसी काम से बाहर गए हैं।”
“क्या करते हैं?”
“वे एक पेशेवर हैं।”
उसका उत्तर सुनकर लोगों की जिज्ञासा और भी बढ़ गई। किसी के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा—
“एक पढ़ा लिखा आदमी होकर उन्होंने अपनी पत्नी और छोटे-छोटे बच्चों को ऐसी जगह कैसे छोड़ दिया? अगर इस शहर में आना ही था, तो पहले खुद व्यवस्था करते, फिर परिवार को बुलाते।”
यह प्रश्न सबके मन में था, लेकिन उसका उत्तर किसी के पास नहीं था।
इसी बीच संध्या होने लगी। तभी दूर से दो व्यक्ति उस ओर आते दिखाई दिए। उनके पहनावे और व्यक्तित्व से वे अच्छे और सम्मानित परिवार के लग रहे थे। वे किसी को खोजते हुए सीधे रोशनी के कमरे की ओर आ पहुँचे।
उधर दिलावर की तबीयत भी अब काफी संभल चुकी थी। उसने उन दोनों को आते देखा तो आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उन्हें अपने घर के भीतर बैठने के लिए कहा।
दोनों व्यक्ति उस औरत के परिवार के ही करीबी रिश्तेदार थे कुछ देर तक आपस में बातचीत होती रही। हालाँकि वहाँ मौजूद लोगों के मन में अनेक प्रश्न थे, लेकिन किसी ने भी उनकी पारिवारिक परिस्थितियों को देखते हुए अधिक पूछताछ करना उचित नहीं समझा। सबने उनकी मर्यादा और सम्मान का ध्यान रखा।
फिर भी एक सवाल सबके मन में बार-बार उठ रहा था—उस औरत का पति अब तक क्यों नहीं लौटा?
कुछ देर बाद वे दोनों व्यक्ति यह कहकर चले गए कि कल आकर उस औरत और बच्चों को वहाँ से ले जाएंगे। वह औरत और उसके बच्चे उस रात रोशनी के घर ही रहे। रोशनी ने उनलोगों के लाइ खाना भी बनाया।
धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा और कई अनकहे रहस्यों से पर्दा उठने लगा।
बातों ही बातों में पता चला कि रोशनी और वह औरत एक ही क्षेत्र की रहने वाली हैं। इतना ही नहीं, वे एक ही बिरादरी से थीं और दूर के रिश्ते में आपस में संबंध भी रखती थीं।
यह जानकर वह औरत स्तब्ध रह गई। उसे कभी कल्पना भी नहीं थी कि अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर, दिल्ली के एक अनजान इलाके में उसकी मुलाकात अपनी ही रिश्तेदार से इस तरह होगी।
अब उसके मन में एक नया भय घर कर गया। बात केवल उसकी परेशानी तक सीमित नहीं रही थी, बल्कि उसकी इज़्ज़त और परिवार की मर्यादा का प्रश्न भी जुड़ गया था।
रोशनी उसकी मनःस्थिति को अच्छी तरह समझ रही थी। आखिर दोनों एक ही समाज, एक ही परिवेश और एक ही बिरादरी से थीं।
कुछ देर बाद उस औरत ने अपना दर्द रोशनी के सामने खोलकर रख दिया। उसने अंत में उससे केवल एक विनती की—
“बहन… इस घटना का ज़िक्र किसी से मत करना।”
उसने रोशनी से यह बात गुप्त रखने का वचन माँगा।
अगले दिन वो दोनों आदमी फिर आ गए और सारा सामान निकाला गया इतना सामान था कि एक छोटी गाड़ी भर गई बड़े ताज्जुब की बात थी कि इतना सामान लेकर वो लोग आए कैसे?
पीछे के अनजान दरवाज़े से अंदर कैसे घुसे?
इतना सारा सामान को अंदर कैसे ले गए?
अंधेरे और गर्मी में अंदर जाने और रहने की हिम्मत कैसे जुटा पाए?
और सबसे बड़ी बात की उस औरत का पति अभी सब के सामने क्यूँ नहीं आया।
यह सब सवाल सब के मन में था लेकिन किसीं ने इतनी गहराई तक जाने चेष्टा नहीं की कारण इतना भाग दौड़ से भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय था जो परत दर परत घटना की तह में जाता। वह औरत अब जा चुकी थी लेकिन यह सारे सवाल सब के मन छोड़ गई थी।
रोशनी स्वयं भी बहुत समझदार और संवेदनशील स्वभाव की महिला थी। वह दूसरों के दुख को अपना दुख समझती थी। उसने बिना कोई प्रश्न किए उसका वचन स्वीकार कर लिया और उसकी मर्यादा की रक्षा करने का निर्णय लिया।
यह कहानी एक वास्तविक घटना से प्रेरित है। इसमें सभी व्यक्तियों के नाम तथा कुछ पहचान संबंधी विवरण उनकी निजता की रक्षा के लिए बदल दिए गए हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, समुदाय या पेशे की छवि को प्रभावित करना नहीं है।