समय का आईना

समय का आईना

आज सुबह जब मैं प्रातः भ्रमण करके घर लौट रहा था, तो आदतन मेरे कानों में इयरफ़ोन लगे हुए थे। मुझे शैक्षिक और प्रेरणादायक पॉडकास्ट सुनने की आदत है। इसके अलावा ग़ज़लें, शेर-ओ-शायरी और साहित्यिक चर्चाएँ भी मुझे बेहद पसंद हैं।

अपनी गली की ओर मुड़ा तो एक मकान के नीचे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति कुर्सी पर बैठे दिखाई दिए। उनके चेहरे और शरीर पर उम्र की गहरी छाप स्पष्ट झलक रही थी। एक ओर झुका हुआ कंधा, हल्के-हल्के काँपते हाथ और थका हुआ चेहरा मानो यह बता रहे थे कि समय आने पर शरीर भी मनुष्य का साथ छोड़ने लगता है। वही आँखें, जिनसे कभी सुई में धागा डालना भी कठिन नहीं था, आज सामने बैठे व्यक्ति को भी स्पष्ट देखने में असमर्थ थीं।

मैं आगे बढ़ गया, लेकिन अचानक उनका चेहरा मुझे परिचित लगने लगा। मेरे कदम आगे बढ़ रहे थे, पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे रोक लिया। कुछ ही क्षणों में मुझे याद आ गया कि ये वही व्यक्ति हैं, जिन्हें मैं वर्षों पहले से जानता हूँ।

वे एक सरकारी कन्या विद्यालय में द्वारपाल (गार्ड) थे। यह केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी। लड़कियों के विद्यालय में अनुशासन बनाए रखना, अनजान लोगों को प्रवेश न करने देना और छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना आसान कार्य नहीं होता। कई बार लोग उनसे उलझ जाते थे, लेकिन वे अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटते थे।

संभव है कि युवावस्था में उन्होंने कोई और काम किया हो, पर जीवन के किसी मोड़ पर उन्हें यह जिम्मेदारी मिली और उन्होंने उसे पूरी निष्ठा से निभाया।

समय कितनी तेजी से बीत जाता है, इसका एहसास तब होता है जब वह बहुत दूर निकल चुका होता है। मुझे दिल्ली आए लगभग चालीस वर्ष होने वाले हैं, लेकिन आज भी ऐसा लगता है जैसे मैं कल ही यहाँ आया हूँ। मेरा बीता हुआ कल और आज, दोनों मेरी आँखों के सामने किसी चलचित्र की तरह घूम जाते हैं। मैंने जीवन में क्या खोया और क्या पाया, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं; उसका साक्षी केवल मैं और मेरा ईश्वर है।

जब मेरी बेटी उसी विद्यालय में पढ़ती थी, तब मैं उसे प्रतिदिन छोड़ने और लेने जाया करता था। कई बार किसी बात पर मेरी और इस गार्ड की कहासुनी भी हो जाती थी। लेकिन समय के साथ मैंने अपने स्वभाव में परिवर्तन लाया। अब मैं हर व्यक्ति के व्यवहार के पीछे छिपी परिस्थितियों और उसकी मजबूरियों को समझने का प्रयास करता हूँ।

आज मुझे महसूस होता है कि किसी व्यक्ति का कठोर व्यवहार हमेशा उसके स्वभाव का परिचायक नहीं होता। कई बार वह उसकी जिम्मेदारियों का परिणाम होता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई पुलिसकर्मी यदि हर व्यक्ति से अत्यधिक विनम्रता से पेश आए, तो संभव है कि वह अपनी ड्यूटी प्रभावी ढंग से न निभा सके। कुछ पद ऐसे होते हैं जहाँ कठोरता भी कर्तव्य का हिस्सा बन जाती है।

मैं उनसे आगे निकल चुका था, लेकिन अचानक मुझे लगा कि यदि मैं बिना मिले चला गया तो यह मेरी संवेदनहीनता होगी। मैं लौटकर उनके पास गया, उन्हें सलाम किया और उनका हालचाल पूछा। मैंने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की कि हमारी मुलाकात कहाँ हुई थी और मैं उन्हें कैसे जानता हूँ।

ऐसा लगा मानो ये बातें अब उनके लिए कोई विशेष महत्व नहीं रखतीं। वे अपनी शारीरिक परेशानियों और बीमारियों का ज़िक्र करने लगे। उनके बोलने के अंदाज़ में शिकायत कम और विवशता अधिक थी। शायद वे केवल इतना चाहते थे कि कोई उनकी बात सुन ले।

उन्हें देखकर मुझे अपनी बेटी का भी स्मरण हो आया। उसी विद्यालय से दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने पास के एक सरकारी विद्यालय से विज्ञान संकाय में बारहवीं की परीक्षा 88 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की और अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

उसकी सफलता के लिए मैं ईश्वर का जितना आभारी हूँ, उतना ही उन सभी शिक्षकों और विद्यालय के कर्मचारियों का भी, जिन्होंने वर्षों तक बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन का दायित्व निभाया। ऐसे लोग केवल आने-जाने वालों पर ही नज़र नहीं रखते, बल्कि बच्चों की गतिविधियों पर भी ध्यान देते हैं। यदि कोई छात्र गलत दिशा में जाता दिखाई दे, तो उसके अभिभावकों को सचेत करना भी वे अपना कर्तव्य समझते हैं। इसी रोक-टोक के कारण उन्हें कई बार लोगों की नाराज़गी और अपमान भी सहना पड़ता है, जबकि वास्तव में वे सम्मान और धन्यवाद के सबसे बड़े अधिकारी होते हैं।

अब मैं उन्हें लगभग प्रतिदिन उसी भवन के प्रवेश द्वार पर बैठा देखता हूँ। कभी-कभी वे छड़ी के सहारे कुछ कदम चलने का प्रयास करते हैं। शायद डॉक्टर ने उन्हें नियमित चलने की सलाह दी होगी।

उन्हें देखकर मुझे बार-बार अपने जीवन का भी एहसास होता है। मन में यही विचार आता है कि काश, मैंने भी समय रहते अपने जीवन को और अधिक व्यवस्थित किया होता। हर व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा मोड़ अवश्य आता है जब वह स्वयं को असहाय महसूस करता है।

दूरदर्शी वही होते हैं जो समय रहते अपने जीवन को व्यवस्थित करते हैं, समय का सदुपयोग करते हैं और विनम्रता को अपना सबसे बड़ा आभूषण मानते हैं। अंततः यही गुण मनुष्य को सम्मान और सच्ची सफलता प्रदान करते हैं।

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