ग़रीबी इंसान से क्या नहीं करवा देती है
गरीबी किसे कहते हैं, यह वही जानता है जिसने अपने जीवन में गरीबी को देखा है या आज भी उसे जी रहा है।
दो वक्त की रोटी और तन ढकने को कपड़ा मिल जाने भर से गरीबी दूर नहीं हो जाती। इंसान को जीवित रहने के लिए केवल भोजन और वस्त्र ही नहीं, बल्कि अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति भी चाहिए। इनके अभाव में वह स्वयं को असहाय, अपाहिज और लज्जित महसूस करता है।
निर्धनता, अर्थात गरीबी, एक इंसान से उसकी खुशियों के साथ-साथ उसका हौसला, उसका हुनर और उसकी सुंदरता तक छीन लेती है। वह जीवन भर चिंताओं में घिरा रहता है और एक दिन इस दुनिया से यह हसरत लेकर चला जाता है कि काश, जो मैं न बन सका, मेरी आने वाली नस्लें बन जाएँ। वे वह जीवन जी सकें, जिसका सुख मैं कभी नहीं भोग सका।
लेकिन यह परंपरा टूटती कब है?
किसी की यही हसरत बनकर रह जाती है—
“मैं तो इस खानाबदोशी में भी खुश हूँ,लेकिन अगली नस्लें न भटकें, उन्हें एक घर तो मिले।”
यदि आप अपने आसपास नज़र दौड़ाएँ, तो समाज का क्रूर चेहरा साफ़ दिखाई देता है। अपने ही बीच ऐसे लोग मिल जाएँगे, जो भीतर-ही-भीतर सिसकते और बिलखते रहते हैं, लेकिन अपनी मर्यादा और स्वाभिमान की खातिर कभी किसी के सामने अपना दुःख नहीं सुनाते। वे विवश होकर जीवन जीते रहते हैं और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता।
यदि आप पिछड़ी जातियों, दलित समाज तथा गरीब और बेसहारा लोगों के जीवन का अध्ययन करें, तो समाज की विषमताओं का भली-भाँति अंदाज़ा लगा सकते हैं। उनमें से बहुत-से लोग आज भी लगभग उसी स्थिति में जीवन जीने को मजबूर हैं, जैसी स्थिति में उनके पूर्वज सदियों पहले जीते चले आए थे। इसकी एक बड़ी वजह हमारा वही समाज है, जिसने कभी दिल से यह नहीं चाहा कि उन्हें भी बराबरी का अधिकार मिले और उनकी स्थिति बेहतर हो।
आख़िर ऐसा क्यों था?
क्योंकि उन्हें गुलाम चाहिए थे। एक इंसान के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था। कोई उन्हें गले लगाना तो दूर, अपने पास बैठाना भी उचित नहीं समझता था। यहाँ तक कि उन्हें अपने से दूर बैठाना ही लोगों को स्वीकार था।
यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और हमारे संविधान का ही परिणाम है कि समय के साथ बहुत-से सुधार हुए हैं और आज भी हो रहे हैं। फिर भी भेदभाव की अनेक दीवारें अब भी खड़ी हैं—धर्म का भेद, नस्ल का भेद, ऊँची और नीची जाति का भेद, रंग का भेद, अमीरी और गरीबी का भेद, और न जाने कितने ही प्रकार के भेदभाव आज भी हमारे समाज में मौजूद हैं।
अब मैं आपके सामने अपने जीवन में बहुत निकट से देखी हुई एक सच्ची घटना प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे इतनी नज़दीक से देखने और उसके हालात को समझने का अवसर शायद मुझे पहली बार मिला था।
किस्सों, कहानियों और समाचार-पत्रों में ऐसी घटनाएँ पढ़ने और सुनने को मिल जाती हैं। बहुत-से लोगों के जीवन में ऐसे दुखद हालात आते हैं कि वे अपना संयम खो बैठते हैं, उनका हौसला टूट जाता है और वे घबराकर कोई अनुचित कदम तक उठा लेते हैं।
लेकिन ठीक इसके विपरीत, ऐसे भी बहुत-से लोग होते हैं जिनके सामने परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, वे न घबराते हैं और न ही कोई गलत रास्ता अपनाते हैं। वे साहस और धैर्य के साथ परिस्थितियों का सामना करते हैं तथा अपनी स्थिति सुधारने का उपाय खोजते रहते हैं। ऐसे लोगों में से अधिकांश अंततः सफलता भी प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि समय चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, वह कभी ठहरता नहीं।
दिल्ली के एक इलाके में, जहाँ मैं अपने परिवार के साथ किराए के एक मकान में रहता था, एक दिन उसी मकान में एक महिला, उसका पति और उसकी बेटियाँ आकर रहने लगीं। वे लोग बिहार के किसी क्षेत्र के निवासी थे। हमने सोचा कि शायद यह व्यक्ति रोज़गार की तलाश में दिल्ली आया होगा, लेकिन पूरे परिवार के साथ आना थोड़ा असामान्य लगा। आमतौर पर लोग पहले अकेले आते हैं और जब काम-धंधा ठीक हो जाता है, तब धीरे-धीरे अपने परिवार को बुला लेते हैं। आखिर नया शहर, नई जगह और नए लोगों के बीच अपने आपको स्थापित करने में समय तो लगता ही है।
दो-तीन दिनों के भीतर ही उस महिला और उसके बच्चों का हमारे घर आना-जाना शुरू हो गया। छोटी-मोटी घरेलू ज़रूरतों का लेन-देन, जैसा हमारे समाज में वर्षों से होता चला आया है, वह भी शुरू हो गया। आने-जाने से थोड़ी निकटता बढ़ी, बातचीत होने लगी और धीरे-धीरे पारिवारिक जानकारी भी मिल गई।
कई दिन बीत गए, लेकिन एक बात हमेशा हमारे ध्यान में रहती थी। इस परिवार के साथ जो व्यक्ति आया था, वह कभी कमरे से बाहर नहीं निकलता था। केवल महिला और उसके बच्चे ही बाहर जाते थे। वह दिनभर कमरे के अंदर बैठा रहता या सोया रहता। समय पर खाना बनता, सब मिलकर खाते और अपना दिन बिताते।
बच्चों में कुछ बड़े थे और कुछ छोटे। उनकी आपसी चहल-पहल और शोर की आवाज़ ऊपर तक साफ़ सुनाई देती थी। लगभग हर दिन उनके घर से किसी न किसी नए व्यंजन की खुशबू आती, जिनमें अधिकतर मछली और मुर्गे की सुगंध होती थी।
हम अक्सर आपस में चर्चा करते और सोचते कि यह व्यक्ति कहीं काम पर नहीं जाता, तो कमाता कैसे होगा? जब कमाएगा नहीं, तो परिवार कैसे चलेगा? लगता है घर से अच्छी-खासी रकम लेकर आया होगा। आखिर घर का खर्च भी चलता था और हर महीने मकान का किराया भी समय पर दिया जाता था। ऐसे न जाने कितने प्रश्न हमारे मन में उठते रहते और हमें उलझन में डाल देते।
वैसे इस परिवार को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। वे किसी संपन्न परिवार से भी नहीं लगते थे। फिर भी उस व्यक्ति के चेहरे पर किसी प्रकार की चिंता दिखाई नहीं देती थी। बेटियाँ उसका बहुत ध्यान रखती थीं। समय पर खाना देतीं, उसकी ज़रूरतों का ख़याल रखतीं। आखिर बेटी, चाहे गरीब की हो या अमीर की, बेटी तो बेटी ही होती है।
उधर रसोई से माँ की आवाज़ लगातार सुनाई देती रहती—
“अरे छोटी, पापा का ध्यान रखना।”
“पापा को समय पर खाना दे देना।”
“चाय भी पूछ लेना।”
घर से बाहर निकलते समय वह बच्चों, विशेषकर बेटियों को आवश्यक बातें समझाकर ही जाती थी। जाते-जाते वह यह कहना भी नहीं भूलती—
“अंदर से दरवाज़ा बंद कर लेना और बिना ज़रूरत कहीं बाहर मत जाना।”
बेटियाँ भी अपनी माँ की हर बात मानती थीं। उनकी आज्ञाकारिता और सलीका देखकर अच्छा लगता था। उनकी कोई भी हरकत कभी बुरी नहीं लगी। वे देखने में भी बहुत सुंदर और संस्कारी लगती थीं।
समय धीरे-धीरे बीतता गया। अब यह सब हमारे लिए एक सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। हमने भी इन बातों पर ध्यान देना लगभग छोड़ दिया था।
एक दिन दोपहर के समय एक ऑटो आकर उनके मकान के सामने रुका। मेरी पत्नी ने बाहर झाँककर देखा तो वही महिला थी। उसके बच्चे उसे सहारा देकर ऑटो से उतार रहे थे। उसका चेहरा बिल्कुल उतरा हुआ था। वह बहुत थकी हुई और बीमार लग रही थी।
हमने सोचा कि शायद उसकी तबीयत खराब होगी। अधिक पूछताछ करना उचित नहीं समझा। केवल हालचाल पूछा और वह अपने कमरे में चली गई।
अपनी माँ को उस हालत में देखकर बेटियाँ बहुत परेशान थीं। सुबह वह बिल्कुल स्वस्थ घर से निकली थी और अब उसकी हालत कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी।
रात को जब उसकी तबीयत कुछ संभली, तो वह हमारी पत्नी के पास आई और बातचीत करने लगी।
उसने बताया,
“आज मैं अपोलो अस्पताल गई थी। वहाँ मेरा चेकअप हुआ। कई तरह के टेस्ट हुए। मुझे तो ठीक से पता भी नहीं कि कौन-कौन से टेस्ट हुए, लेकिन बहुत समय लग गया। गर्मी भी बहुत थी, इसलिए मैं बहुत परेशान हो गई।”
मेरी पत्नी से रहा नहीं गया। उसने पूछा,
“तुम यहाँ अपना इलाज कराने आई हो? अपोलो तो बहुत महँगा अस्पताल है। तुम्हें तो एम्स या सफदरजंग अस्पताल जाना चाहिए था। आखिर ऐसी कौन-सी बीमारी है, जिसका इलाज वहाँ करा रही हो?”
फिर उसने सारी बातें बताईं—
“मैं जिनके घर में काम करती हूँ, उन्हीं लोगों के साथ यहाँ आई हूँ। वे लोग पास के ही एक फ्लैट में रहते हैं। यहाँ रहने, खाने-पीने और इलाज का सारा खर्च भी वही लोग उठा रहे हैं।
मेरे मालिक की किडनी खराब हो चुकी है। उनका अपोलो अस्पताल में इलाज चल रहा था। बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। अब डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी है। इसके अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं बचा था। उन्हें एक किडनी डोनर की आवश्यकता थी और वे अच्छी-खासी रकम देने को तैयार थे।
मेरे लिए इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता था? मेरी दो बेटियाँ जवान हैं। किसी भी हाल में उनकी शादी करनी है। मेरे पति की आमदनी इतनी नहीं है कि एक साथ इतना पैसा जुटा सकें। वे भी क्या करते? इसलिए मैंने ही अपनी एक किडनी देने का फैसला कर लिया।”
उसकी बात सुनकर हमारे मन में उठ रहे सारे प्रश्नों के उत्तर एक साथ मिल गए। अब हमें समझ में आ गया कि उसका रोज़-रोज़ अस्पताल जाना क्यों हो रहा था।
उस महिला का अपने परिवार के प्रति त्याग देखकर मन भर आया। उससे भी अधिक उसके पति के प्रति उसका समर्पण मन को छू गया। उसने अपने पति को सचमुच अपना जीवनसाथी ही नहीं, बल्कि अपना सबसे बड़ा सहारा माना था। परिवार की सारी ज़िम्मेदारी भले ही पति की थी, लेकिन कठिन समय आने पर उसने स्वयं आगे बढ़कर वह बोझ अपने कंधों पर उठा लिया।
सबसे बड़ी बात यह थी कि उसने केवल इतना बड़ा त्याग ही नहीं किया, बल्कि अपने पति को भी ऐसा करने से रोक दिया। वह चाहती थी कि उसके पति की सेहत और जीवन सुरक्षित रहें। स्वयं दर्द सहकर भी उसकी चिंता अपने पति और बच्चों के लिए ही थी।
जब भी दर्द से कराहती हुई बच्चों से कुछ कहती, तो सबसे पहले यही पूछती—
“पापा को खाना दे दिया?”
“चाय पिला दी?”
“पापा ने दवा खा ली?”
उसकी हर बात में अपने पति की चिंता साफ़ दिखाई देती थी।
लगभग एक सप्ताह बाद वह दिन भी आ गया, जब उसे अस्पताल में भर्ती होना था। सारी चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसकी एक किडनी निकालकर मरीज का प्रत्यारोपण किया गया।
उसके बाद कई दिनों तक वह दिखाई नहीं दी।
जब वह वापस लौटी, तो पहले से कहीं अधिक कमज़ोर दिखाई दे रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं रही थी।
मेरी पत्नी कुछ पूछती, उससे पहले ही उसने स्वयं कहा—
“मैंने अपनी एक किडनी दे दी है। उसके बदले मुझे तीन या पाँच लाख रुपये मिले हैं। अब मैं अपनी दोनों बेटियों की शादी कर सकूँगी। रिश्ते पहले से तय हैं, बस पैसों की कमी थी। दान-दहेज और शादी के खर्च की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। ऊपर वाले ने वह रास्ता भी निकाल दिया।”
उसकी आँखों में दर्द भी था और संतोष भी। शायद उसे लग रहा था कि उसने अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर लिया है।
कुछ समय बाद, जब उसकी तबीयत थोड़ी संभली, तो वह बाज़ार जाने लगी। धीरे-धीरे शादी का सामान खरीदकर लाती रही। कुछ ही दिनों में उसने लगभग सारी ज़रूरत का सामान इकट्ठा कर लिया।
कुछ ही दिनों बाद वह दिन भी आ गया, जब उन्हें अपने गाँव लौटना था।
उस दिन बच्चे बहुत खुश थे। उनके चेहरों पर एक अलग ही चमक थी। नए-नए कपड़े, नए जूते-चप्पल, दो बड़े-बड़े लगेज और उनमें भरा शादी का सामान—सब कुछ देखकर ऐसा लग रहा था मानो उनके सारे सपने पूरे होने वाले हों।
लेकिन उन सामानों के पीछे एक माँ का ऐसा त्याग छिपा था, जिसे शायद ही कोई समझ सकता था। वह अपने शरीर का एक अनमोल अंग देकर अपने बच्चों की खुशियाँ खरीदकर ले जा रही थी।
उस दृश्य ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
उस दिन मैंने बहुत करीब से महसूस किया कि गरीबी इंसान को किन-किन परिस्थितियों से गुज़रने पर मजबूर कर देती है। गरीबी वास्तव में बहुत बेरहम होती है। वह इंसान को हर दिन, हर पल थोड़ा-थोड़ा मरने पर मजबूर करती है। कई बार वह उससे वह कीमत भी वसूल लेती है, जिसकी कल्पना करना भी कठिन होता है।
कुछ समय बाद सुनने में आया कि उस महिला की तबीयत फिर कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो सकी। और विडंबना यह रही कि जिस व्यक्ति के लिए उसने इतना बड़ा त्याग किया था, वह भी कुछ समय बाद इस दुनिया से चला गया।
जीवन का यही सबसे बड़ा सत्य है—
यदि शरीर स्वस्थ है, तो हर इंसान अमीर है।और यदि शरीर बीमार है, तो हर इंसान गरीब है।
इसलिए यदि हम स्वस्थ हैं, तो हमें हर पल अपने रब का शुक्र अदा करना चाहिए।
स्वास्थ्य से बड़ा धन इस संसार में कोई नहीं।
पैसों की आँधी -एक सीख
अगर आपको यह लेख पसंद आया हो, तो अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया अवश्य दें। आपकी राय और सुझाव मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।