समय, आयु और मनुष्य का विवेक

समय, आयु और मनुष्य का विवेक

जब भी मेरी अम्मा किसी बड़े उम्र के व्यक्ति को समझाती थीं, तो अक्सर उसकी उम्र का ज़िक्र ज़रूर करती थीं। उनका एक प्रिय शब्द था—”सिन रसीदा” मतलब उम्र दराज़। इससे उनका आशय यह होता था कि उम्र तो काफ़ी बीत चुकी है, लेकिन न सोच में परिपक्वता दिखाई देती है, न व्यवहार में समझदारी और न ही चरित्र में गंभीरता।

पुराने लोगों की एक विशेषता यह भी थी कि वे अपनी बात को किसी न किसी कहावत से अवश्य जोड़ते थे। यदि किसी की नासमझी पर कटाक्ष करना होता तो तुरंत कहतीं—

“नाच न जाने, आँगन टेढ़ा।”

आज यह लेख मैं स्वयं अपने लिए और अपने जैसे सभी सिन रसीदा “उम्रदराज़” लोगों के नाम लिख रहा हूँ। मेरा उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं, बल्कि मन के दर्पण पर जमी धुंध को हटाने का एक छोटा-सा प्रयास करना है—वही धुंध, जिसकी परछाईं अब चेहरों पर भी साफ़ दिखाई देने लगी है।

अब तो आईना भी कभी-कभी भयभीत कर देता है। सिर से झड़ते बाल, और जो कुछ बचे हैं, वे भी कंघी करते ही इस तरह गिरने लगते हैं मानो झाड़ू लगाने के बाद फर्श पर बिखरा कूड़ा एक जगह इकट्ठा हो गया हो।

चेहरे के वे भाव और रेखाएँ, जो कभी आकर्षण और ताज़गी की पहचान थीं, अब इतने बदल चुके हैं कि कभी-कभी स्वयं को पहचानना भी कठिन लगने लगता है।

समय के साथ मनुष्य का चेहरा कुछ इस प्रकार बदलता है, जैसे किसी पुराने एल्युमिनियम के बर्तन जिसकी पहले जैसी कोई निश्चित आकृति नहीं रह जाती। ऐसा लगता है मानो पिघली हुई धातु अपनी इच्छा से इधर-उधर फैल गई हो और समय ने उस पर अपनी मनचाही नई आकृति अंकित कर दी हो।

जीवन स्वयं अपने कर्मों का हिसाब माँगता है, लेकिन दुःख की बात यह है कि वह हिसाब उस समय माँगता है जब मनुष्य के पास कोई उत्तर शेष नहीं रह जाता।

काश! यह हिसाब तब लिया जाता, जब मनुष्य के पास अपनी भूलों को सुधारने का अवसर और उत्तर देने का अधिकार होता। लेकिन यही तो जीवन का नियम है। मनुष्य को मोहलत दी जाती है, स्वतंत्रता दी जाती है कि जाओ, जैसा चाहो वैसा करो। फिर एक दिन ऐसा आता है जब वही मनुष्य अपने ही कर्मों के जाल में स्वयं फँस जाता है, और उस समय उसे संभालने वाला कोई नहीं होता।

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि जब समय जीवित होता है, तब उसका विवेक सोया रहता है; और जब विवेक जागता है, तब तक समय मर चुका होता है।

जीवन की यही सबसे बड़ी विडंबना है। जिसने इस सत्य को समय रहते समझ लिया, वह सफल हो गया; और जिसने इसे नज़र अंदाज़ किया, वह अपनी ही लापरवाही का शिकार होकर नष्ट हो गया।

हममें से अधिकांश उम्रदराज़ लोग, जिन्हें समाज बुज़ुर्गों की पंक्ति में खड़ा कर देता है, वास्तव में एक बड़ी नाइंसाफ़ी का शिकार होते हैं। जबकि उनमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और अनुभवजन्य दृष्टि से इतनी क्षमता और समझ होती है कि वे आज भी समाज के लिए उपयोगी और मूल्यवान सिद्ध हो सकते हैं।

लेकिन हमारे समाज में एक अजीब-सी परंपरा बन गई है कि जैसे ही कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु में पहुँचता है—और कई बार तो पचास या पचपन वर्ष की उम्र में ही—उसे मानो सक्रिय जीवन से अलग कर दिया जाता है। उसे एक ऐसे कोने में बैठा दिया जाता है जहाँ उसकी मूलभूत आवश्यकताओं का प्रबंध तो कर दिया जाता है, लेकिन उसकी योग्यता, अनुभव और आत्मसम्मान की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे वह कोई असहाय व्यक्ति हो, जिससे अब किसी प्रकार के योगदान की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

आश्चर्य की बात यह है कि कुछ लोग स्वयं भी इस स्थिति को अपनी नियति मान लेते हैं। वे धीरे-धीरे समाज और जीवन से दूरी बना लेते हैं और यह मान बैठते हैं कि अब उनका समय समाप्त हो चुका है। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल भिन्न है।

समय की धुंध में खोया एक मुसाफ़िर

ठंड का मौसम था। शाम गहराने लगी थी। मुझे गाज़ियाबाद से सिम्भावली जाना था। बस अड्डे पर उस रूट की एक बस खड़ी थी। मैं उसमें जाकर बैठ गया। खिड़की वाली सीट पर एक व्यक्ति पहले से ही कंबल ओढ़े बैठा था।

मैंने उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अनजान मुसाफ़िरों से यूँ ही बातचीत करना मुझे कभी उचित नहीं लगा।

कुछ ही देर में बस चल पड़ी। थोड़ी देर बाद उसने मेरी ओर देखकर पूछा,

“भाई, तू एजाज़ दिखे है?”

मैंने मुस्कुराकर कहा,

“हाँ भाई, तुमने सही पहचाना। लेकिन तुम कौन हो?”

उसने अपना नाम बताया और अपना गाँव भी, जो सिम्भावली के पास जाट समाज का एक गाँव था। फिर बोला,

“तूने मुझे नहीं पहचाना? मैं सुनील हूँ। हम दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे।”

मैंने उसे गौर से देखा, लेकिन पहली नज़र में पहचान ही नहीं पाया।

उसकी वेशभूषा, चेहरा और चाल-ढाल देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई साठ-पैंसठ वर्ष का बुज़ुर्ग सामने बैठा हो। जबकि कॉलेज छोड़े मुश्किल से बीस वर्ष ही हुए थे। इसका अर्थ था कि हम दोनों की उम्र चालीस-बयालीस वर्ष से अधिक नहीं रही होगी।

रास्ते भर बातें होती रहीं। वह भी अब बच्चों वाला था और मैं भी। परिवार, जिम्मेदारियाँ, रोज़ी-रोटी और जीवन के उतार-चढ़ाव—सब पर चर्चा हुई।

बातों ही बातों में उसने एक वाक्य कहा, जो आज भी मेरे मन में उसी स्पष्टता से गूँजता है जैसे उस दिन बस में गूँजा था—

“पूत सपूत है तो क्यों धन संचय, और पूत कपूत है तो क्यों धन संचय।”**

इसके बाद हमारा अंतिम पड़ाव आ गया। वह अपने रास्ते उतर गया और मैं अपने।

समय की धुंध में वह कहीं खो गया… और मैं भी अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गया।

लेकिन वह कुछ ऐसे प्रश्न छोड़ गया जो आज भी मेरे भीतर उठते रहते हैं।

आख़िर लोग स्वयं को इतना क्यों थका देते हैं?

वे अपने आपको इतना असहाय क्यों मान बैठते हैं कि चालीस वर्ष की उम्र में ही साठ-सत्तर वर्ष के दिखाई देने लगते हैं?

अधिक आयु के स्त्री-पुरुष अपने भीतर अनुभव, दूरदृष्टि और समझ का ऐसा खज़ाना रखते हैं कि वे केवल नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक ही नहीं बन सकते, बल्कि स्वयं भी एक सक्रिय, सम्मानपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकते हैं—बशर्ते उनके भीतर कुछ करने, कुछ सीखने और आगे बढ़ने का उत्साह जीवित रहे।

कहा भी गया है—

“मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।”

मनुष्य अपने बारे में जैसा सोचता है, धीरे-धीरे वैसा ही बनता चला जाता है।

मनुष्य अपने अतीत की गलतियों को उस समय नहीं सुधार सकता, जब समय का पहिया इतना आगे निकल चुका हो कि लौटना असंभव हो जाए। मैं जीवन की उस अवस्था की बात कर रहा हूँ जहाँ पहुँचकर जीवन स्वयं थकने लगता है और मनुष्य अपने ही कर्मों का हिसाब अपने अंतःकरण से लेने लगता है।

तब उसे एहसास होता है कि वह किन रास्तों पर भटक गया, कहाँ-कहाँ उससे भूलें हुईं और आज जो कुछ वह भोग रहा है, वह उसके अपने ही निर्णयों का परिणाम है।

जैसा कि कहा गया है—

“अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”

समय एक कठोर शिक्षक है। वह पहले परीक्षा लेता है और सबक बाद में समझ में आता है। जब तक मनुष्य सीखता है, तब तक बहुत कुछ उसके हाथ से निकल चुका होता है।

ऐसी अवस्था में मनुष्य अपनी संतान से अनेक आशाएँ बाँध लेता है। लेकिन सौभाग्यशाली वही माता-पिता होते हैं जिनकी आशाएँ पूरी हो जाती हैं। निस्संदेह सभी संतानें कर्तव्यविमुख नहीं होतीं, किन्तु हर व्यक्ति इतना भाग्यशाली भी नहीं होता कि उसे अपने अधूरे सपनों की निरंतरता अपने बच्चों में दिखाई दे।

मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति दूसरों पर नहीं, बल्कि स्वयं पर विश्वास करने में है। यह सोच लेना कि कोई न कोई मेरा सहारा अवश्य बनेगा—चाहे वह अपनी संतान ही क्यों न हो—कभी-कभी एक खतरनाक भ्रम भी सिद्ध हो सकता है।

हर व्यक्ति अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त है—अपनी परेशानियों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों में उलझा हुआ।

यदि जीवन ने आपके सामने उलझनें खड़ी की हैं, तो उन्हें सुलझाने की कला भी आपको स्वयं ही सीखनी होगी। अपने भीतर साहस जगाइए, आत्मबल बढ़ाइए और अपने साधन विकसित करने का प्रयास कीजिए। यदि ऐसा न कर सकें, तो उन कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार रखिए, जिनकी न किसी ने कल्पना की होती है और न ही कोई उनकी जिम्मेदारी लेने आता है।

यदि मनुष्य समय रहते इन सच्चाइयों को समझ ले, तो वह भटकाव, विनाश और पछतावे से अवश्य बच सकता है—बशर्ते उस पर ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन बना रहे।

रिश्ते नातों की सच्चाई

जब भी मैं रिश्तों को निकट से देखता हूँ, तो उनमें प्रेम, अपनापन और आत्मीयता की धुँधली-सी तस्वीरें दिखाई देती हैं। ऐसा लगता है मानो हर चेहरे के पीछे एक और चेहरा छिपा हो। आज के अधिकांश रिश्ते स्वार्थ के धागे से बँधे हुए हैं। जब तक स्वार्थ बना रहता है, रिश्ता भी जीवित रहता है; और जैसे ही स्वार्थ समाप्त होता है, वही रिश्ते पेड़ से झड़ते पत्तों की तरह बिखर जाते हैं—बेसहारा, असहाय और अकेले।

आज के समय में बहुत-से निकट संबंधी, यहाँ तक कि परिवार के सदस्य भी, मिलना-जुलना तो दूर, फ़ोन करना, फ़ोन उठाना या किसी संदेश का उत्तर देना भी आवश्यक नहीं समझते। यदि कोई व्यक्ति उनके स्वभाव, उनके स्वार्थ या उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप न हो, तो उनसे दूरी ही बनाए रखना चाहते हैं।

लेकिन यदि उन्हीं लोगों के साथ थोड़ी-सी उपेक्षा कर दी जाए, तो देखिए वे किस प्रकार शिकायतों और आरोपों का सिलसिला शुरू कर देते हैं।

इसलिए मेरा मानना है कि ऐसे लोगों से सम्मानजनक दूरी बनाए रखना ही बेहतर है। यह दूरी घृणा या क्रोध के कारण नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और मानसिक शांति के लिए होनी चाहिए।

स्वयं पर विश्वास रखिए और अपने जीवन को सक्रिय बनाइए। कुछ नया सीखते रहिए, कुछ नया करते रहिए। अपने आपको इतना सार्थक और रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखिए कि यह सोचने का समय ही न मिले कि किसने फ़ोन किया, किसने नहीं किया, किसने संदेश पढ़ा या नहीं पढ़ा, और कौन मिलने आया या नहीं आया।

अपने अकेलेपन को अभिशाप नहीं, बल्कि ईश्वर का एक अनमोल अवसर समझिए। इसी समय में स्वयं को सँवारिए, अध्ययन कीजिए, चिंतन कीजिए, ईश्वर की उपासना कीजिए और नई-नई तकनीक सीखिए। नई तकनीक से डरिए नहीं, बल्कि उसे अपनाइए, क्योंकि आज के युग में सीखने की कोई आयु नहीं होती।

दुनिया में ऐसे असंख्य लोग हुए हैं जिन्होंने जीवन के उत्तरार्ध में ऐसे महान कार्य किए, जिनके कारण उनका नाम इतिहास में अमर हो गया। इसलिए अपनी बढ़ती हुई आयु को कभी अपनी कमजोरी मत बनने दीजिए। उसे अपने अनुभव, परिपक्वता और विवेक की सबसे बड़ी शक्ति बनाइए।

यदि आप ऐसी विवशता से बचना चाहते हैं, तो सबसे पहले स्वयं को संभालिए। किसी से यह अपेक्षा मत रखिए कि वह आपको अवश्य समझेगा, आपकी प्रशंसा करेगा या आपकी भावनाओं का सम्मान करेगा।

याद रखिए, आपके व्यक्तित्व का मूल्य किसी और के प्रमाणपत्र से निर्धारित नहीं होता।

अपने संकल्प को दृढ़ बनाइए, एकांत से मित्रता कीजिए और मौन को अपनी गरिमा बना लीजिए। जहाँ आवश्यकता न हो, वहाँ प्रतिक्रिया देने से बचिए, क्योंकि अनेक अवसरों पर मौन ही सबसे गहरा, सबसे गरिमामय और सबसे प्रभावशाली उत्तर होता है।

अंत में केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि जीवन की साँझ, जीवन का अंत नहीं होती। यदि मनुष्य के भीतर उत्साह जीवित हो, सीखने की इच्छा बनी रहे और ईश्वर पर विश्वास अडिग हो, तो बढ़ती हुई आयु भी एक नई सुबह का आरंभ बन सकती है।

समय शरीर को अवश्य थका देता है, लेकिन दृढ़ संकल्प, जागृत चेतना और जीवित आत्मविश्वास को कभी पराजित नहीं कर सकता।

याद रखिए—बुढ़ापा शरीर की अवस्था है, मन की नहीं। जिस दिन मनुष्य सीखना, आगे बढ़ना और जीवन को उद्देश्यपूर्ण ढंग से जीना छोड़ देता है, उसी दिन वास्तविक बुढ़ापा शुरू होता है। लेकिन जब तक मन में आशा, कर्म में निष्ठा और ईश्वर पर विश्वास बना हुआ है, तब तक जीवन की हर साँझ एक नई सुबह की संभावना अपने भीतर संजोए रहती है

ग़रीबी इंसान से क्या नहीं करवा देती हैhttps://authorejazkhan.in/2026/07/21/%e0%a4%97%e0%a4%bc%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%ac%e0%a5%80-%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/

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