गाँव मे वर्षा ऋतु का आनंद

(मेरी पुस्तक ” भूली बिखरी यादें ” का एक अध्याय )

गाँव में वर्षा ऋतु का आनंद

बरसात का मौसम केवल एक ऋतु नहीं था, बल्कि गाँव के जीवन की धड़कन हुआ करता था।

जैसे किसी घर में नवजात शिशु के आगमन से पहले छोटे-छोटे कपड़े, पालना और खिलौने सजाए जाते हैं, उसी प्रकार वर्षा के आने से पहले गाँवों में भी एक अलग प्रकार की हलचल शुरू हो जाती थी। किसान अपने हल, बैल, कुदाल और फावड़े तैयार करने लगते। खेतों की मेड़ों की मरम्मत होती और हर व्यक्ति आने वाले मौसम की तैयारी में जुट जाता।

गाँव के बुज़ुर्ग कहा करते थे—

“बरखा रुत हरियाली, तेरी बात है निराली।”

वास्तव में वर्षा ऋतु का महत्व केवल किसानों तक सीमित नहीं था। यह पूरे गाँव के जीवन को प्रभावित करती थी।

अरमान के जन्म से कुछ वर्ष पहले बिहार और बंगाल के कई क्षेत्रों में भयंकर सूखा पड़ा था। उस त्रासदी की कहानियाँ गाँव के बुज़ुर्ग अक्सर सुनाया करते थे। लोग बताते थे कि कैसे वर्षा के अभाव में खेत सूख गए थे, फसलें नष्ट हो गई थीं और अनेक परिवारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

शायद यही कारण था कि गाँव के लोग वर्षा को केवल मौसम नहीं, बल्कि ईश्वर की विशेष कृपा मानते थे।

पहली अच्छी बारिश होते ही पूरे गाँव का स्वरूप बदल जाता।

जहाँ कल तक धूल उड़ती थी, वहाँ अब हरियाली दिखाई देने लगती। खेतों में पानी भर जाता। किसान अपने बैलों के साथ जुताई में लग जाते। दूर-दूर तक केवल हल चलते दिखाई देते।

सुबह-सुबह खेतों की ओर जाते किसानों की आवाज़ें सुनाई देतीं।

कहीं बैलों की घंटियाँ बजतीं।

कहीं औरतें सिर पर भोजन की टोकरी रखे खेतों की ओर जातीं।

कहीं बच्चे बारिश के पानी में खेलते दिखाई देते।

पूरा वातावरण जीवंत हो उठता।

अरमान को यह मौसम सबसे अधिक प्रिय था।

बरसात शुरू होते ही वह और उसके मित्र नदी, नालों और तालाबों की ओर निकल पड़ते। माता-पिता लाख मना करते, लेकिन बच्चों की टोली किसी-न-किसी बहाने वहाँ पहुँच ही जाती।

कभी वे बारिश में भीगते हुए दौड़ लगाते।

कभी कागज़ की नाव बनाकर बहाते।

कभी तालाब के किनारे घंटों बैठकर पानी में उठती लहरों को देखते रहते।

उनके लिए यह मौसम किसी त्योहार से कम नहीं था।

उस समय पूर्वी भारत में वर्षा आज की तुलना में कहीं अधिक नियमित होती थी। कई-कई दिनों तक सूरज दिखाई नहीं देता था। आसमान में घने काले बादल छाए रहते और लगातार वर्षा होती रहती।

रात में जब बिजली चमकती, तो पूरा आकाश एक क्षण के लिए उजाले से भर जाता।

बादलों की गर्जना सुनकर छोटे बच्चे डर जाते और अपनी माँओं से लिपट जाते।

कई बार बिजली इतनी निकट गिरती कि घरों की खिड़कियाँ तक काँप उठतीं।

गाँव के अधिकांश घर मिट्टी के बने होते थे।

उनकी छतें खपरैल या फूस की होती थीं।

बरसात आने से पहले हर घर में छप्परों की मरम्मत का काम शुरू हो जाता।

गाँव की छतों पर काम करते मजदूर दूर से ऐसे दिखाई देते मानो बंदरों की कोई टोली उछल-कूद कर रही हो।

लेकिन इतनी तैयारी के बाद भी तेज़ बारिश कई बार सारी व्यवस्था बिगाड़ देती।

छत से पानी टपकने लगता।

घर के लोग बर्तन और बाल्टियाँ रखकर पानी रोकने का प्रयास करते।

सबसे कठिन समय रात का होता।

कभी सोते-सोते अचानक बिस्तर भीग जाता।

कभी दीवार से पानी रिसने लगता।

और कभी लगातार बारिश के कारण मिट्टी की कोई दीवार ढह जाती।

फिर भी लोग शिकायत कम और हँसी-मज़ाक अधिक करते थे।

उन्हें मालूम था कि यही वर्षा कुछ महीनों बाद उनके घरों के अनाज के कोठार भरने वाली है।

उधर खेतों में भी जीवन अपने पूरे वेग से चल रहा होता।

किसान कीचड़ में घुटनों तक धँसकर काम करते।

औरतें धान की रोपाई करतीं।

दूर-दूर तक झुकी हुई महिलाओं की कतारें दिखाई देतीं, जो लोकगीत गाते हुए काम करती रहतीं।

उन गीतों की मधुर ध्वनि हवा के साथ बहती हुई पूरे वातावरण में फैल जाती।

अरमान कई बार घंटों खड़ा होकर यह सब देखता रहता।

उसे लगता मानो पूरा गाँव एक विशाल परिवार हो, जहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में जीवन की इस महान प्रक्रिया में भाग ले रहा है।

बरसात की अपनी परेशानियाँ थीं।

कीचड़ था।

मच्छर थे।

बीमारियाँ थीं।

बाढ़ का डर था।

लेकिन इन सबके बावजूद वर्षा गाँव वालों के लिए आशा, समृद्धि और जीवन का प्रतीक थी।

आज जब अरमान उन दिनों को याद करता है, तो उसे केवल बारिश की बूँदें ही याद नहीं आतीं।

उसे याद आते हैं—

कीचड़ में खेलते बच्चे,

खेतों में काम करते किसान,

धान रोपती महिलाएँ,

खपरैल पर गिरती बूंदों की टप-टप,

और वर्षा के साथ जीवंत हो उठता पूरा गाँव।

समय बदल गया है।

गाँव बदल गए हैं।

मौसम भी पहले जैसे नहीं रहे।

लेकिन स्मृतियों में आज भी वह वर्षा ऋतु वैसी ही ताज़ा है—हरी-भरी, जीवंत और जीवन से भरपूर।

मानो सावन की कोई पुरानी फुहार आज भी मन के आँगन में धीरे-धीरे बरस रही हो।

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