हवा में फूले हुए लोग
हमारे आस पास में कई रंग, कई रूप और कई ढंग के लोग मिल जाएंगे। सबका अपना-अपना अंदाज़ होता है। हर आदमी दूसरे से अच्छा बनना चाहता है, दूसरे से अच्छा दिखना चाहता है। और ऐसा होना स्वाभाविक भी है। ऊपर वाले ने सबको एक समान बनाया भी नहीं है। किसी को अमीर बनाया, किसी को गरीब; किसी को खूबसूरत, किसी को साधारण; किसी को गोरा, किसी को सांवला। किसी के पास बहुत कुछ है तो किसी के पास बहुत कम।
यह संसार अपनी विभिन्नता से ही पहचाना जाता है। हर व्यक्ति की सुंदरता, उसकी पहचान और उसका मूल्य उसकी अपनी मौलिकता और असलियत में होता है। जब किसी चीज़ में बनावट या मिलावट आ जाती है तो उसका मूल्यांकन भी उसी आधार पर होने लगता है।
लेकिन हमारे आसपास कुछ लोगों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अपनी पहचान पर भरोसा नहीं होता। उन्हें अपनी असलियत पर फ़ख्र नहीं होता। उन्हें बहरूपियापन अच्छा लगता है। वे अपने भीतर ऐसी हवा भर लेते हैं कि उनका स्वाभाविक रूप कहीं पीछे छूट जाता है और वे अपने लिए एक नई आकृति बना लेते हैं।
आज लोगों के पास साधन बढ़े हैं, पैसा बढ़ा है और दिखावे के अवसर भी बढ़े हैं। अब तो ऐसा लगता है कि समाज में दो ही जातियाँ रह गई हैं—एक अमीर की और दूसरी गरीब की। न कोई ऊँचे कुल का रहा, न नीचे कुल का; न बड़ी जाति रही, न छोटी जाति। जिसके पास पैसा है, वह अपने लिए हर वह चीज़ खरीद सकता है जिसे कभी केवल अमीरों, नवाबों या राजघरानों की पहचान माना जाता था।
शादियों को ही देख लीजिए। कैसी-कैसी सजावटें, कैसे-कैसे खाने-पीने के इंतज़ाम, कैसे कपड़े और कैसे गहने! दूल्हे के बदन पर महंगी से महंगी शेरवानी और दुल्हन के लिए लाखों का लहंगा-चोली—जो देखते ही बनता है। चाहे दूल्हे के बदन पर वह शेरवानी ऐसी क्यों न लगे जैसे लोमड़ी ने शेर की खाल पहन ली हो, लेकिन पहनेंगे जरूर। कभी शेरवानी अमीरों और नवाबों की पहचान हुआ करती थी।
साधन होना कोई बुरी बात नहीं है। पैसा है तो उसका उपयोग कीजिए, सुविधा है तो उसका आनंद लीजिए। समस्या तब शुरू होती है जब उपयोग के साथ हवा-बाज़ी और कलाबाज़ी भी जुड़ जाती है। आदमी अपने भीतर तरह-तरह की हवाएँ भरता है और धीरे-धीरे अपने स्वाभाविक आकार से बाहर निकलकर एक नई आकृति धारण कर लेता है।
मैं एक दिन अपने किसी परिचित के साथ गाड़ी लेने गया। वहाँ लोगों का व्यवहार देखकर मैं स्तब्ध था। खरीदार के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा था जैसे अभी-अभी कोई दूल्हा-दुल्हन घर आए हों और उनका रस्मो-रिवाज के साथ स्वागत किया जा रहा हो। कहाँ बिठाना है, कहाँ उठाना है, क्या खिलाना है, क्या पिलाना है—सब कुछ बड़े सलीके और औपचारिकता से।
मुझे लगा कि खरीदार में एक खास तरह की हवा भरने की कोशिश की जा रही है और खरीदार भी उस हवा को बड़े आनंद से अपने भीतर भर रहा है।
उस दिन गाड़ी की डिलीवरी थी, इसलिए औपचारिकता कुछ ज्यादा ही थी। गाड़ी के ऊपर कपड़ा डाला गया, फिर हटाया गया। यह क्रिया तीन बार हुई। फोटोग्राफी हुई। तरह-तरह की रस्में निभाई गईं। ग्राहक को ऐसा ट्रीटमेंट दिया गया कि शायद वह वर्षों तक उस दिन को याद रखे।
लेकिन गाड़ी किस्तों पर ली गई थी। दो-चार किस्तें टूट जाएँ तो फिर देखिए वही हवा कहाँ जाती है!
कंपनियाँ अपने उत्पाद बेचने और ग्राहकों को लुभाने के लिए किस तरह हवा भरती हैं, इसका एक उदाहरण विज्ञापनों में दिखाई देता है। गुटखा, तंबाकू और सिगरेट के विज्ञापनों को देखिए। एक रुपये की पुड़िया बेचने के लिए ऐसे राजमहल, ऐसे शानदार कपड़े, जूते और गाड़ियाँ दिखाई जाती हैं जैसे अभी किसी देश का राजकुमार अवतरित हुआ हो।
कमाल यह है कि जिसने विज्ञापन किया, वह खुद शायद उस चीज़ को हाथ भी न लगाए; लेकिन एक आदमी उसे खा-खाकर अपने मुँह की ऐसी नई और भद्दी शक्ल बना लेता है कि पहचानना मुश्किल हो जाए। फिर जहाँ-तहाँ इस तरह थूकता फिरता है जैसे उसे शहर की दीवारों पर अपना हस्ताक्षर करने का अधिकार मिल गया हो।
कुछ लोगों में ऐसी हवाएँ भरी होती हैं कि उनका अंदाज़ ही निराला हो जाता है।
कुछ बुलेट मोटरसाइकिल चलाने वालों को देखिए। यदि शरीर लंबा-चौड़ा और मजबूत हो तो मोटरसाइकिल उन पर जँचती भी है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी कमर 26 इंच और पतलून 34 इंच की होती है। लंबाई चार फुट दो इंच और पतलून छह फुट के आदमी की! चौड़ाई ऐसी कि उसमें चार पैर एक साथ समा जाएँ।
पैर जमीन पर ठीक से टिकते नहीं और बुलेट पर स्टंट दिखाते फिरते हैं। फिर ऐसी मोटरसाइकिल पसंद करेंगे जिसके पहिए बड़े हों, टायर मोटे हों और जिसकी शक्ल-सूरत देखकर ऊँट याद आ जाए। उस पर बैठते ही उनका शरीर कुछ इस तरह फैल जाता है जैसे कोई खुला हुआ चिमटा हो।
BMW, Mercedes और दूसरी महंगी गाड़ियों के कुछ चालकों को देखिए। गाड़ी महंगी होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन गाड़ी की कीमत अगर आदमी के व्यवहार की कीमत तय करने लगे तो समस्या है। अक्सर खबर सुनने को मिलती है कि किसी तेज़ रफ्तार या लापरवाही से चल रही कार ने कितने लोगों को कुचल दिया।
मैं गोविंदपुरी से ओखला की तरफ जा रहा था। भयंकर ट्रैफिक जाम था। ऐसा लग रहा था जैसे आगे के सारे रास्ते बंद हों। ऊपर से गर्मी अपना जलवा अलग दिखा रही थी। जिसे जहाँ थोड़ी जगह दिखाई देती, वहीं घुसने की ताक में रहता।
मेरे बराबर में एक थार थी और सामने डीटीसी की बस। थार वाले की बेचैनी कहूँ या घमंड—वह रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसके बस में होता तो शायद अपनी गाड़ी को उड़ा ले जाता। अच्छा था कि सामने बस थी, लेकिन फिर भी वह मानने को तैयार नहीं था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसे देखते ही बाकी सभी लोग अपनी-अपनी गाड़ियाँ किनारे कर देंगे।
बड़ी होटलों में मेहमानों के साथ होने वाले व्यवहार को देखिए। जिसे लोग “फाइव स्टार ट्रीटमेंट” कहते हैं। दस रुपये की चीज़ दो सौ रुपये में दी जाती है और ग्राहक चूँ तक नहीं करता। वही आदमी बाहर किसी दुकानदार से एक रुपये के लिए लड़ पड़ता है।
कमाल है हवा का!
जैसी हवा आदमी के भीतर भर दी जाती है, वह वैसी ही आकृति में ढलने लगता है। थोड़ा-सा सम्मान मिला तो फूल गया, थोड़ी-सी दौलत आई तो फूल गया, महंगी गाड़ी मिली तो फूल गया, किसी बड़े आदमी ने दो शब्द क्या बोल दिए—पूरा गुब्बारा बन गया।
कुछ रिश्तेदारों को देखिए जिनके चेहरे हमेशा फूले हुए दिखाई देते हैं, खासकर जब उनके पास नई दौलत आई हो। कमजोर या गरीब रिश्तेदारों से ऐसा व्यवहार करेंगे जैसे उनसे कोई छूत की बीमारी फैल जाएगी। अपनी चीज़ों की ऐसी नुमाइश करेंगे जैसे दूसरों को चिढ़ाना ही उनका उद्देश्य हो।
शादियों में लेन-देन ऐसा करेंगे जैसे कोई महाराजा हों। लेकिन अगर उनसे किसी जरूरतमंद की मदद करने या किसी अच्छे काम में योगदान देने को कह दीजिए तो उनकी जेब अचानक भुखमरी की कगार पर पहुँच जाती है।
फैक्ट्री और ऑफिस में भी कुछ साहब मिल जाएंगे जो अपने पद की हवा में ऐसे फूले रहते हैं कि सीधे मुँह अपने स्टाफ से बात करना भी उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगता है। दूसरी तरफ कुछ कर्मचारियों की मजबूरी होती है। वे “बाबूजी”, “साहबजी”, “जी हुजूर” करते नहीं थकते और धीरे-धीरे साहब को इतना फुला देते हैं कि वह खुद को बहुत बड़ा गुब्बारा समझने लगता है।
फुलाना भी एक हुनर है
किसी को फुलाना केवल मजबूरी नहीं होती, बल्कि कई बार यह एक समाधान भी होता है। अगर किसी अजनबी या अनजान प्रभावशाली व्यक्ति से कोई काम है और वह काम करवाना भी जरूरी है, तो निश्चित है कि बातचीत की शुरुआत सीधे अपने काम से नहीं की जा सकती। पहले कुछ सुंदर शब्दों का सहारा लेना पड़ता है।
जैसे कोई अपेक्षाकृत कमजोर या जरूरतमंद व्यक्ति किसी बड़े आदमी के पास किसी काम के लिए जाता है, तो वह सीधे यह तो नहीं कहेगा कि, “मेरा यह काम है और आपको करना ही होगा।” ऐसा कहने पर बनता हुआ काम भी बिगड़ सकता है। बल्कि यह भी संभव है कि बात इतनी बिगड़ जाए कि जूतों तक की नौबत आ जाए।
ऐसे में सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि उसकी खुशामद करके काम लिया जाए। मसलन—
“बाबूजी, नमस्ते! आपका बड़ा नाम सुना है। लोगों ने आपके बारे में बहुत कुछ बताया है। सबने कहा कि फलाँ साहब के पास जाओ, वही चाहेंगे तो तुम्हारा काम बन जाएगा। बाबूजी, आप बहुत दयालु हैं। आप मुझ पर अपनी कृपा अवश्य कीजिए। आपकी बड़ी मेहरबानी होगी। बड़ी उम्मीद लेकर आपके पास आया हूँ।”
इत्यादि।
तो ऐसे समय में किसी को फुलाना जरूरी भी हो सकता है, एक तरीका भी हो सकता है और एक तरह का उसूल भी। अब वह साहब सचमुच उन बातों से फूल जाते हैं या फिर अपनी इंसानियत और जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए उस जरूरतमंद का काम कर देते हैं—यह उनके अपने ज़मीर पर निर्भर करता है।
इसलिए कई बार फुलाना भी बहुत कारगर होता है, लेकिन फुलाने का भी एक सही तरीका और सही समय होता है। हर व्यक्ति को एक ही तरह से नहीं फुलाया जा सकता और हर परिस्थिति में एक ही भाषा काम नहीं आती।
और हाँ, यहाँ “फुलाना” शब्द को “फूँकना” समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। दोनों शब्द अलग हैं और दोनों के अर्थ भी अलग हैं। यहाँ किसी को फुलाने का अर्थ है—उसकी प्रशंसा करके उसके मन को प्रसन्न करना, उसके आत्मसम्मान को सहलाना और अपनी बात मनवाने की राह आसान करना।
कभी यह खुशामद होती है, कभी मजबूरी और कभी परिस्थितियों से निकलने का एक व्यावहारिक तरीका। फर्क केवल इतना है कि इसका इस्तेमाल किस नीयत से और किस सीमा तक किया जा रहा है।
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि हर गंभीर या कम बोलने वाला व्यक्ति घमंडी होता है।
मुझे इस बात में कोई बुराई नज़र नहीं आती कि कोई व्यक्ति कम बोलता हो, बहुत अधिक संजीदा रहता हो या अपने व्यवहार में एक मर्यादा रखता हो। हर उम्र की अपनी गरिमा होती है, हर रिश्ते की अपनी गरिमा होती है और हर पद की भी अपनी गरिमा होती है। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची और घर के बड़े-बूढ़े; शिक्षक, गुरु, अधिकारी या किसी संस्था के वरिष्ठ—इन सबके पद और संबंध के अनुसार एक मर्यादा होती है और उसका पालन भी होना चाहिए।
लेकिन मैं उन हवाओं की बात नहीं कर रहा हूँ।
मैं उन बनावटी हवाओं की बात कर रहा हूँ जिन्हें लोग बिना जरूरत अपने भीतर भर लेते हैं और फिर उसी हवा के बल पर दूसरों पर अपना रौब झाड़ते रहते हैं।
हर चीज़ की एक उम्र होती है और अपने समय पर वह अच्छी भी लगती है। लेकिन वही चीज़ समय से बाहर की जाए तो शर्मिंदगी या हास्यास्पद स्थिति का कारण बन सकती है।
बच्चे का तोतलाकर बोलना कितना प्यारा लगता है—
“मम्मी-मम्मी, मुझे टॉफी दे दो… मम्मी, मुझे गोद में ले लो।”
लेकिन वही बच्चा बड़ा होकर जवान हो जाता है। उसकी भाषा में आत्मविश्वास आता है, उसकी चाल में ठहराव आता है और उसके व्यवहार में एक अलग गरिमा दिखाई देती है।
फिर बुढ़ापा आता है और उसके अपने भाव, अपनी जरूरतें और अपना व्यवहार होते हैं।
लेकिन अगर उम्र अपनी जगह छोड़कर किसी दूसरी उम्र की भूमिका निभाने लगे तो वही बात असहज और हास्यास्पद लग सकती है।
मसलन, अगर बड़ी उम्र का आदमी अपनी माँ के सामने उसी तरह तोतलाते हुए कहे—
“मम्मी-मम्मी, मुझे टॉफी दे दो… मुझे गोद में ले लो…”
तो दृश्य अजीब लगेगा।
बात गलत इसलिए नहीं लगेगी कि माँ से प्रेम करना गलत है, बल्कि इसलिए कि व्यवहार और उम्र के बीच का संतुलन टूट गया है।
समय का चक्र घूमता रहता है और अच्छे-अच्छों की हवा निकाल देता है। एक उम्र के बाद हर गुब्बारा पिचकता है। दौलत, पद, गाड़ी, कपड़े, दिखावा और रौब—सब समय के सामने धीरे-धीरे अपना आकार खो देते हैं।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके भीतर बनावटी हवा नहीं होती। उनके भीतर सच्चाई होती है, ईमानदारी होती है, सादगी होती है और जिम्मेदारी होती है।
वे समय के साथ फूलते नहीं, बल्कि फूलों की तरह खिलते हैं।
समय की धूल उनके चेहरे पर आती है, मगर उनकी पहचान को मैला नहीं कर पाती। उनकी उम्र बढ़ती है, लेकिन उनका सम्मान घटता नहीं। उनका पद चला जाता है, दौलत चली जाती है, शरीर कमजोर हो जाता है—फिर भी लोग उन्हें याद करते हैं।
क्योंकि उन्होंने अपने भीतर हवा नहीं भरी थी, उन्होंने अपने भीतर मूल्य भरे थे।
और शायद यही मनुष्य की असली पहचान है—
जो आदमी हवा से फूलता है, वह हवा निकलते ही पिचक जाता है;
जो आदमी अपने चरित्र से ऊँचा उठता है, वह मरने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है
इंसान की मनोदशा, स्वार्थ और इंसानियतhttps://authorejazkhan.in/2026/08/12/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5-%e0%a4%94/